#संघ
#मैंसंघहूँ
#मैंसमणहूँ
#मैंसमणसंघहूँ
#Sangh
#IamSangh
#IamSaman
#IamSamanSangh
समण सभ्यता, समण संस्कृति, समण संस्कार, समण पराम्परा, समण रीति-रिवाज, समण रस्म, समण रुढ़ी, समण पुरखे, समण सियान, समण महापुरुष, समण संत, समण परिपाटी, समण विरासत, समण धरोहर, समण कृषक, समण धन्नासेठ, समण व्यापारी, समण शासक, समण सेवक, समण समाज, समणों की सम विषम परिस्थितियों के चलते हमारा संघ घायल हुआ टूटता गया क्योंकि किसी ने संघघात पहुंचाने के लिए अमुक नाम देते गये कोई कुनबा बोला, कोई कुटुंब बोला, कोई कबीला बोला, कोई आदि निवासी बोला, कोई आदि वासी बोला, कोई मूल निवासी बोला, कोई शिकारी बोला, कोई हंटर गेदरर बोला, कोई जंगली जानवर बोला, कोई वन वासी बोला, तो कोई मेरे काम से बांध दिया काम से बांट दिया तो कोई किसान, तो कोई कमेरा, तो कोई कुम्हार, तो कोई चमार, तो कोरी, तो कोई....तो कोई सरकारी पहचान का ठप्पा लगा दिया तो कोई आरक्षण तो कोई दलित आदिवासी पिछड़ा तो कोई एससी एसटी ओबीसी पहचान के कार्ड बांटे दिये। ठीक वैसे जैसे राजनीति के ठप्पे लगे कांग्रेसी बहुजन भाजपा के ठप्पे पीठ में लगायें...
फिर वादी कहना शुरू कर दिया, बुद्धवादी, कबीरवादी, अम्बेडकरवादी, रैदासवादी, नानकवादी, कांशीरामवादी, बिरसावादी, तो कोई जलवादी तो कोई जंगलवादी तो कोई जमीन पहाड़ वादी...कौण कोण वादी हो लिख लो संघ उतना ही टूटता जायेगा तुम कमजोर हो जाओगे कुटुंब कुनबा कबीला कमेरा ढेरा संतो का ढेरा बिखरा तो धर्मों में संघ टूटेगा। तो तुम्हें टूटना है या इकट्ठा संघ में जुड़ना यहां संघ दो ही है। एक संघ जो तुम्हारी सुख सुरक्षा की उन्नति करने वाला.. दूसरा संघ जो तुम्हारा सब कुछ लूटने पीटने वाला... इसलिए समय रहते संघ से जुड़ों जोड़ों ना केवल तुम्हारे हक अधिकार छीने जाने रहे बल्कि तुम्हारी पहचान तुमसे छीनी जा रही है। हम समान मन के लोग समान दुःख दर्द के लोग समान सुख सुविधा के लोग किसके लिए लड़ रहे हो कौन तुम्हें लड़ा रहा है जबकि हमारी एक पहचान समन है हमारा मन वैसे है जैसे हमारी खून खाल रक्त मासमज्जा सुख दुःख भय वेद वेदना समान है। इसलिए #मैंसमनहूँ #मैंसंघहूँ #मैंसमनसंघहूँ!

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