Tuesday, August 6, 2024

संघ शासन हेतु संघ संसद



#संघ
जुड़ेंगे, जीतेंगे
जिद्द है, जुड़ने की
जब जुड़ेंगे, तब जीतेंगे
जितना जुड़ेंगे, उतना जीतेंगे
जहां जहां जुड़ेंगे वहां वहां जीतेंगे
जैसे जैसे जुड़ेंगे वैसे वैसे जीतेंगे
जो जुड़ेंगे वो ही जीतेंगे
अभी जुड़ेंगे तो अभी जीतेंगे
100 साल बाद जुड़ेगे तो 100 साल बाद जीतेंगे
जुड़ोऔर जीतो!

:::संघ:::
ऐसा संघ जो अच्छे #स्वतंत मार्ग पर चले।
ऐसा संघ जो सीधे #बन्धुत्त मार्ग पर चले। 
ऐसा संघ जो विधि #न्याय मार्ग पर चले।
ऐसा संघ जो उचित #समता मार्ग पर चले।
ऐसा समण संघ। हमर अपना #समण संघ।
ऐसा समण संघ जो
बमणों का नहीं, समणों का संघ है। 
विषमता का नहीं, समता का संघ है।

°संघ Sangh°

Ten Golden Rule of Saman Sangh
1. Only Saman be innate members. 
2. Never ever Chanda in sangh. 
3. Never ever caste practices. 
4. Only Sanghwad no individualism in sangh. 
5. Sangh never offers to postposition daise and garland. 
6. Never ever the registration of saman Sangh. 
7. Order of the sangh is Ultimate. 
8. Sangh will never enter into politics. 
9. Never ever return of the sangh traitor. 
10. Nine rules unchangeable eternal and permanent.

" दस गोल्डन नियम" (Ten Golden Rule)
1. समण संघ में केवल समण ही आ सकते हैं
2. समण संघ में कभी चन्दा नहीं लिया जायेगा
3. हम केवल समण हैं, संघ में कभी जाति का अभ्यास नहीं होगा. यानि किसी भी जाति के नाम का संबोधन नहीं किया जायेगा
4. समण संघ में केवल संघवाद रहेगा, व्यक्तिवाद को कोई स्थान नहीं
5. संघ में कभी भी पद-प्रतिष्ठा-मंच-माला को कोई स्थान नहीं होगा.
6. समण संघ का पंजीकरण कभी नहीं होगा
7. संघादिसेस यानि संघ का आदेश सभी के लिए सबसे ऊपर रहेगा
8. संघ राजनीति में कभी नहीं जायेगा
9. संघ घातक की वापसी संघ में कभी नहीं होगी
10. उपरोक्त 1 से 9 तक के नियम संघ का आधार हैं, ये ना कभी बदले जायेंगे और ना ही कभी ख़त्म किये जायेंगे और ना ही कभी अमान्य किये जायेंगे।

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रोज़ाना शायं 8 बजे से 11बजे
Join कीजिए इस 👇लिंक पर..
https://us02web.zoom.us/j/82044258465...
और आईडी पासवर्ड 👇ये रहेगा।
Meeting ID: 820 4425 8465
Passcode: 1234
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we the people समण संघ का हिस्सा बनकर जुड़िए और लोगो को जोड़िए।
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‘समण संघ’ :-  बुद्ध से पहले एक संघ चलता था 'समण संघ'। जिसे हमारे ही पुरखों ने चलाया था। सभी प्रकार के निर्णय और फैसले संघ के द्वारा ही किये जाते थे। संघ का निर्णय ही सर्वोपरि माना जाता था। संघ के द्वारा ही चक्रवर्ती महान सम्राट अशोक ने स्वर्णिम शासन चलाया। सम्राट अशोक ने ही अपने शासन के दौरान “महाभारत” बनाया था।
बम्मण लोग जब भारत में आये तो हम समता में रहने वाले ‘समण-समणी’ कहलाये गए। बाद में समण शब्द को ही विकृत करके और काल्पनिक किस्सों और कहानियों के जरिए हमारी समण संस्कृति विलुप्त होती चली गयी, आज उसी समण संघ को फिर से झाड़ पोंछ कर अपने समण लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। बुद्ध ने बार-बार संघ की शरण में जाने को कहा है- ‘संघं शरणं गच्छमि’। बाबा साहब ने भी भारत गणराज्य संघ ही दिया है। समण संघ ही हमारे देश का सबसे पुराना संघ है। और केवल हम ही संघी हैं।
वास्तविक संघ की परिकल्पना लोगों के लिए, लोगों के द्वारा ही संचालित होती है। संघ का कोई नेता नहीं होता। संघ में कोई पद या पदाधिकारी नहीं होता। संघ के लिए कोई चंदा, पर्ची, शुल्क आदि नहीं लिया जाता।
We the People की ऑनलाइन मीटिंग zoom app (ज़ूम एप) पर रोजाना शाम को ठीक 8 बजे से होती है जिसमें समण समाज के देश भर के बुद्धिजीवी लोग शामिल होते हैं और जुड़ने व जोड़ने का लगातार कार्य कर रहे हैं। दुनिया भर के लोग जुड़ चुके हैं और आगे जोड़ रहे हैं।

Saturday, August 3, 2024

संघ शासन हेतु संघ संसद

 



#संघ

#मैंसंघहूँ

#मैंसमणहूँ

#मैंसमणसंघहूँ

#Sangh

#IamSangh

#IamSaman 

#IamSamanSangh

समण सभ्यता, समण संस्कृति, समण संस्कार, समण पराम्परा, समण रीति-रिवाज, समण रस्म, समण रुढ़ी, समण पुरखे, समण सियान, समण महापुरुष, समण संत, समण परिपाटी, समण विरासत, समण धरोहर, समण कृषक, समण धन्नासेठ, समण व्यापारी, समण शासक, समण सेवक, समण समाज, समणों की सम विषम परिस्थितियों के चलते हमारा संघ घायल हुआ टूटता गया क्योंकि किसी ने संघघात पहुंचाने के लिए अमुक नाम देते गये कोई कुनबा बोला, कोई कुटुंब बोला, कोई कबीला बोला, कोई आदि निवासी बोला, कोई आदि वासी बोला, कोई मूल निवासी बोला, कोई शिकारी बोला, कोई हंटर गेदरर बोला, कोई जंगली जानवर बोला, कोई वन वासी बोला, तो कोई मेरे काम से बांध दिया काम से बांट दिया तो कोई किसान, तो कोई कमेरा, तो कोई कुम्हार, तो कोई चमार, तो कोरी, तो कोई....तो कोई सरकारी पहचान का ठप्पा लगा दिया तो कोई आरक्षण तो कोई दलित आदिवासी पिछड़ा तो कोई एससी एसटी ओबीसी पहचान के कार्ड बांटे दिये। ठीक वैसे जैसे राजनीति के ठप्पे लगे कांग्रेसी बहुजन भाजपा के ठप्पे पीठ में लगायें...

फिर वादी कहना शुरू कर दिया, बुद्धवादी, कबीरवादी, अम्बेडकरवादी, रैदासवादी, नानकवादी, कांशीरामवादी, बिरसावादी, तो कोई जलवादी तो कोई जंगलवादी तो कोई जमीन पहाड़ वादी...कौण कोण वादी हो लिख लो संघ उतना ही टूटता जायेगा तुम कमजोर हो जाओगे कुटुंब कुनबा कबीला कमेरा ढेरा संतो का ढेरा बिखरा तो धर्मों में संघ टूटेगा। तो तुम्हें टूटना है या इकट्ठा संघ में जुड़ना यहां संघ दो ही है। एक संघ जो तुम्हारी सुख सुरक्षा की उन्नति करने वाला.. दूसरा संघ जो तुम्हारा सब कुछ लूटने पीटने वाला... इसलिए समय रहते संघ से जुड़ों जोड़ों ना केवल तुम्हारे हक अधिकार छीने जाने रहे बल्कि तुम्हारी पहचान तुमसे छीनी जा रही है। हम समान मन के लोग समान दुःख दर्द के लोग समान सुख सुविधा के लोग किसके लिए लड़ रहे हो कौन तुम्हें लड़ा रहा है जबकि हमारी एक पहचान समन है हमारा मन वैसे है जैसे हमारी खून खाल रक्त मासमज्जा सुख दुःख भय वेद वेदना समान है। इसलिए #मैंसमनहूँ #मैंसंघहूँ #मैंसमनसंघहूँ!

एससी एसटी की जातियों में आरक्षण का वर्गीकरण

*बिग ब्रेकिंग न्यूज*

1,अगस्त 2024

*एससी एसटी की जातियों में आरक्षण का वर्गीकरण


करने का सुप्रीम कोर्ट  का फैसला संविधान के अनुच्छेद 341एवम 16(4)के विरुद्ध*

*सब क्लासीफिकेशन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पॉलिसी मेकिंग की श्रेणी में,जबकि सुप्रीम कोर्ट को संविधान में एडिशन डिलिशन, और मोडिफिकेशन का अधिकार नही मिला है*

*आर्टिकल 16 (4)  में राज्य सरकार को अनूसूचित जाति की सूची में संशोधन का अधिकार नही है बल्कि भारत के संविधान के प्रयोजन के लिए बनी scst की सूची में शामिल जातियों के ग्रुप को आरक्षण देने की ड्यूटी है*🙏🏾

*अनुसूचित जातियों की सूची में अब सब क्लासीफिकेशन कर अलग अलग जातियों में आरक्षण बांटने का अधिकार राज्य सरकारों को देने की संविधान विरोधी पैरवी की है केंद्र और पंजाब सरकार ने*🙏🏾

*सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष रखने के लिए अटॉर्नी जनरल तुषार मेहता के पत्र का जवाब सामाजिक न्याय मंत्रालय ने नही दिया*🙏🏾

*एससी का केंद्र की नौकरियों में 15% आरक्षण को 5% के हिसाब से यदि तीन भागों में बांटा तो आरक्षण का रोस्टर के हिसाब से 7,वे पद के स्थान पर,20 वा पद होगा आरक्षित  19 पदों तक की नौकरियां की रिक्तियों हो जाएंगी आरक्षण से बाहर*🙏🏾

समानित साथियों

   पदोन्नती  आरक्षण समाप्त करने के बाद  आज सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जातियों की सूची में सब क्लासिफिकेशन करने का अधिकार   राज्य सरकारों को दे दिया है अब राज्य सरकार  scst की सूची में सब क्लासिफिकेशन करके आरक्षण को कई भागों में बांट जा सकते है ,इस फैसले को scst के लोग अब तक के संविधान के सबसे बड़े नुकसान  के रूप में देख रहे है

                        18 वीं लोकसभा के पहले दिन प्रधान मंत्री संविधान का सजदा  कर और  विपक्ष के अधिकांश सांसद अपने साथ संविधान लेकर संसद गए और जब उनकी शपथ हुई तो उन्होंने संविधान को हाथ में लेकर शपथ ली और अधिकांश सांसदों ने जय भीम जय संविधान का नारा भी बुलंद किया ,देश के सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण पर एक ऐसा फैसला आ गया है जिसमें केंद्र सरकार और पंजाब राज्य की केजरीवाल सरकार ने अनुसूचित जाति की सूची में सब क्लासिफिकेशन की संविधान विरोधी पैरवी करके देश में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ अब तक का सबसे बड़ा अन्याय किया है ,संविधान का अनुच्छेद 341 संसद को अनुसूचित जाति की सूची में से किसी भी जाति को शामिल करने  अथवा बाहर निकालने  की शक्ति प्रदान करता है  परंतु बीजेपी की केंद्र सरकार और पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसी पैरवी की है , जो अधिकार संविधान में संसद को नहीं मिले  है उन अधिकारों को राज्य सरकार को देकर अनुसूचित जाति के आरक्षण में बटवारा कर उनको आरक्षण के लाभ से वंचित कर संविधान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला कराने में कामयाब हो गए है,   आज   सुप्रीम कोर्ट का 7 जजों का फैसला,7 :1 से जनता के सामने है संविधान पीठ में एक महिला जज ने संविधान के पक्ष में सब क्लासिफिकेशन को गलत बताया 

 संसद में जाते वक्त संविधान को माथे से लगाने वाले मा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संविधान को हाथ में लेकर संसद में जाने वाले सांसदों की असली  परीक्षा आज से तय मानी जा रही है , सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 16(4) और 341  की जो व्याख्या की है उसे संविधान सम्वत नहीं कहा जा सकता ,जिन सांसदों को संविधान बचाने के लिए संविधान अनुयायियों ने लोकसभा में भेजा है उनसे उम्मीद ज्यादा है,

 मामला पुराना है 1975 में ज्ञानी जैल सिंह की पंजाब सरकार ने एक आदेश जारी कर पंजाब के  वाल्मीकि और मजहबी सिख  समुदाय के लोगो को एससी के आरक्षण में बंटवारा करके 50% आरक्षण देने का एक आदेश जारी कर दिया था जो लंबे समय तक चलता रहा 

      एक अन्य  मामला आंध्र प्रदेश राज्य का था जिसमें अनुसूचित जाति के आरक्षण को तत्कालीन आंध्र प्रदेश सरकार ने वर्ष 2000 में सब क्लासिफिकेशन कर  विधान सभा से एक्ट बना दिया जिसे ई वी चिन्नईया ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी और वह हार गया और राज्य सरकार अपने एक्ट को बचाने में कामयाब हो गई थी,

इसी आधार पर पंजाब सरकार ने भी वाल्मिकी और मजहबी सिख समुदाय के लोगो के लिए 50%,  आरक्षण का एक्ट 2006 में बना लिया

ई वी चिन्नईया ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के संविधान विरोधी सब क्लासिफिकेशन के आदेश को माननीय सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी के माध्यम से चुनौती दी , नवंबर 2004 में ई  वी चिनय्या की  एसएलपी सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार हो गई और आंध्र प्रदेश सरकार का वर्ष 2000 का अनुसूचित जातियों में क्लासिफिकेशन का नोटिफिकेशन और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का संविधान विरोधी आदेश रद्द कर दिया , ई वी चिनय्या केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि यदि कोई आरक्षित वर्ग की जाती आरक्षण में पिछड़ रही है तो उसके लिए  आरक्षण का बंटवारा नहीं होगा बल्कि उसकी शिक्षा रोजगार और आर्थिक मामलों में राज्य सरकार मदद करें इसी आधार पर पंजाब सरकार का 2006 का नोटिफिकेशन भी पंजाब हाई कोर्ट में 2010 में निरस्त कर दिया उसके बाद पंजाब सरकार इस केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट आई और सुप्रीम कोर्ट में यह  एसएलपी के रूप में तीन जजों की बेंच के पास सुनवाई के लिए गया परंतु इस क्लासिफिकेशन के मामले में ई  वी चिन्नईया का पांच जजों का फैसला आड़े आ गया इस मामले में  कानूनी पक्ष तो यह

कहता है कि संविधान पीठ के 5 जजों के एकतफा फैसले के बाद पंजाब सरकार की एसएलपी खारिज करने के बजाय बड़ी बैंच को सौंप दिया

5 जजों की बैंच बनी तो फिर ई वी चिनय्या संविधान सम्वत फैसला बाधा बन गया उन्होंने भी पंजाब सरकार के अनुरोध पर 7 जजों की बैंच गठित करके ई वी चिनय्या के केस के रि विजिट rew करने की सिफारिश कर दी,

*सुप्रीम कोर्ट रूल 2013 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को केवल Rew patition  या क्यूरेटिव पिटिशन के आधार पर पलट सकती है Rew patition फैसले के 30 दिन के अंदर दाखिल हो सकती थी, नवम्बर 2004 के जजमेंट को सुप्रीम कोर्ट नियमावली 2013 के विरुद्ध करीब 19 साल बाद चिनय्या केस reopen हुआ*

सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के पांच जजों के फैसले के आधार पर  तीन जजों की पीठ को  पंजाब राज्य  की एसएलपी को चिन्नईया केस के आधार पर निरस्त कर देनी चाहिए थी क्योंकि बेंच के सामने संविधान पीठ का सिर्फ एक ही फैसला था इसलिए इस केस में बड़ी बेंच बनने का कोई औचित्य नहीं बनता था परंतु इस केस में बड़ी बेंच बनाने की सिफारिश  कर दी उसके बाद इस केस में पांच जजों की बेंच बनी और पांच जजों की,बेंच ने इस केस में और बड़ी बेंच बनाने की सिफारिश कर दी और यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया तेलंगाना विधान सभा चुनाव के समय मोदी जी एक चुनावी सभा को सम्बोधित कर रहे थे और वहां एससी की एक जाति के एक व्यक्ति ने  मंच पर आकर मोदी जी से अनुसूचित जाति की सूची में सब क्लासिफिकेशन कर अलग आरक्षण देने की मांग कर डाली मोदी जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि हम तुम्हें अलग से आरक्षण  देंगे परंतु संवैधानिक व्यवस्थाएं केंद्र सरकार को इस काम को करने की इजाजत नहीं दे रही थी हालांकि बीजेपी तेलंगाना में चुनाव हार गई और तेलंगाना में कांग्रेस सरकार बन गई ,परंतु दक्षिण भारत में 

बीजेपी ने अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए फूट डालो राज करो के फार्मूले के चलते मोदी सरकार के प्रबंधको ने राजा के मुंह से तेलंगाना में आरक्षण बंटवारे के लिए निकले शब्द पूरा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से रास्ता निकलवाकर एससी एसटी के आरक्षण पर चोट पंहुचा दी है,

 पंजाब सरकार का सब क्लासिफिकेशन मामले पर एक केस पेंडिंग था उसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में अचानक शुरू हो गई और उसमें आनन फानन में सात जजो की बेंच गठित कर दी गई अटॉर्नी जनरल  तुषार मेहता ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार को पत्र भेज कर केंद्र सरकार को अपना पक्ष बताने के लिए निवेदन किया परंतु केंद्र सरकार ने अटॉर्नी जनरल के सब क्लासिफिकेशन के पत्र का कोई जवाब नहीं दिया  इस केस में  पंजाब सरकार ने सब क्लासिफिकेशन करने की पूर जोर पैरवी भी की वही केंद्र सरकार ने भी अनुसूचित जाति की सूची में सब क्लासिफिकेशन कर आरक्षण के बंटवारे पर अपनी हामी भर दी , हालांकि इस मामले में पूर्व में  केंद्र सरकार ने भारत के सभी राज्यों से पत्र भेजकर सब क्लासिफिकेशन करने के संबंध में उनकी राय मांगी थी जिसमें 14 राज्यों ने संविधान के अनुच्छेद 341 का हवाला देकर सब क्लासिफिकेशन करने से मना कर दिया था वही सात राज्यों ने केंद्र सरकार के पत्र का कोई जवाब नहीं दिया था और सात राज्यों ने क्लासिफिकेशन करने का अनुरोध किया था, यह जवाब भी सुप्रीम कोर्ट में पूर्व में ही केंद्र सरकार की ओर से  पत्रावली पर उपलब्ध था,  पंजाब में क्लासिफिकेशन कर वाल्मीकि एवं मजहबी सिख  समुदाय को 50% आरक्षण का बंटवारा कर  आरक्षण कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा ने भी दिया और केजरीवाल सरकार भी जिस प्रकार संविधान की बात करते है और सुप्रीम कोर्ट में  केंद्र सरकार के साथ  मिलकर संविधान को नेस्तनाबूद करने की वकालत करते है  संविधान पर अब तक के सबसे बड़े हमले में कांग्रेस आम आदमी पार्टी और बीजेपी  तीनों  की सरकार शामिल है  राजनैतिक पार्टियों के फूट डालो और राज करो की चालाकी पर आज सुप्रीम कोर्ट  की मुहर लग गई है अब आने वाला समय बताएगा, की केंद्र सरकार इस फैसले पर रिव्यू पटीशन दाखिल करता है या संसद से इस फैसले को निरस्त करेंगे ,दूसरी परीक्षा विपक्ष की है जिन्होंने संविधान की रक्षा के मुद्दे पर चुनाव लडा वह अब क्या करेंगे , अनुसूचित जाति का एक बड़ा वर्ग निश्चित रूप से संविधान विरोधी फैसले से आहत है और उसने संविधान बचाने के नाम पर वोट दिया ,अब आने वाला समय बताएगा की संविधान  के सामने सजदा कर 18 वी लोक सभा के लिए नई संसद में जाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी जिन्होंने एक चुनावी सभा में कहा था कि यदि बाबा साहेब आंबेडकर जी भी धरती पर आ जाए वे भी संविधान को बदल नही पाएंगे ,विपक्षी सांसदों ने संविधान की किताब हाथ में लेकर संसद में जाने वाले  विपक्षी सांसदों की  एक बड़ी परीक्षा शुरू हो चुकी है ,जिसमें किसकी जीत होगी और किसकी हार होगी यह तो आने वाला समय बताएगा आरक्षण का बंटवारा होकर यह अधिकार राज्यों को चला गया  है  यह संविधान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला है इसकी भरपाई अनुसुचित जाति के   ना तो वो लोग कर पाएंगे जो अलग आरक्षण की मांग कर रहे है ,और ना वो कर पाएंगे जो संविधान को सब कुछ अपना मानते है ,आने वाली पीढ़ियां   सरकारों और सुप्रीम कोर्ट से सब क्लासिफिकेशन मांगने वालों का मूल्यांकन जरूर करेंगी संविधान बचाओ ट्रस्ट ने केस की पैरवी की है केंद्र सरकार ,पंजाब सरकार और देश के बड़े जाने माने वकीलों ने भले ही इस केस में संविधान के विरुद्ध पैरवी की हो ,परंतु संविधान बचाओ ट्रस्ट को संविधान सम्वत फैसला आने की उम्मीद है थी फिर भी  फैसला संविधान के पक्ष में हमारी उम्मीद के अनुरूप नहीं आया है इसलिए ट्रस्ट रिव्यू  पटिशन की तैयारी की जा  रही है जल्दी ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट रिव्यू पेटिशन दाखिल की जाएगी

राजकुमार एडवोकेट 

*संविधान बचाओ ट्रस्ट भारत संघ* 9152095833

*नोट*  *यह मैसेज संविधान में आस्था रखने वालो की जागरूकता के लिए लिखा गया है इसे कोई भी व्यक्ति अपने नाम से भी शेयर कर सकता है*

Friday, July 26, 2024

University Truthseeker Society


 #संघ

जुड़ेंगे, जीतेंगे

जिद्द है, जुड़ने की

जब जुड़ेंगे, तब जीतेंगे

जितना जुड़ेंगे, उतना जीतेंगे

जहां जहां जुड़ेंगे वहां वहां जीतेंगे

जैसे जैसे जुड़ेंगे वैसे वैसे जीतेंगे

जो जुड़ेंगे वो ही जीतेंगे

अभी जुड़ेंगे तो अभी जीतेंगे

100 साल बाद जुड़ेगे तो 100 साल बाद जीतेंगे

जुड़ोऔर जीतो!


:::संघ:::

ऐसा संघ जो अच्छे #स्वतंत मार्ग पर चले।

ऐसा संघ जो सीधे #बन्धुत्त मार्ग पर चले। 

ऐसा संघ जो विधि #न्याय मार्ग पर चले।

ऐसा संघ जो उचित #समता मार्ग पर चले।

ऐसा समण संघ। हमर अपना #समण संघ।

ऐसा समण संघ जो

बमणों का नहीं, समणों का संघ है। 

विषमता का नहीं, समता का संघ है।

#संघ


Ten Golden Rule of Saman Sangh

1. Only Saman be innate members. 

2. Never ever Chanda in sangh. 

3. Never ever caste practices. 

4. Only Sanghwad no individualism in sangh. 

5. Sangh never offers to postposition daise and garland. 

6. Never ever the registration of saman Sangh. 

7. Order of the sangh is Ultimate. 

8. Sangh will never enter into politics. 

9. Never ever return of the sangh traitor. 

10. Nine rules unchangeable eternal and permanent.


" दस गोल्डन नियम" (Ten Golden Rule)

1. समण संघ में केवल समण ही आ सकते हैं

2. समण संघ में कभी चन्दा नहीं लिया जायेगा

3. हम केवल समण हैं, संघ में कभी जाति का अभ्यास नहीं होगा. यानि किसी भी जाति के नाम का संबोधन नहीं किया जायेगा

4. समण संघ में केवल संघवाद रहेगा, व्यक्तिवाद को कोई स्थान नहीं

5. संघ में कभी भी पद-प्रतिष्ठा-मंच-माला को कोई स्थान नहीं होगा.

6. समण संघ का पंजीकरण कभी नहीं होगा

7. संघादिसेस यानि संघ का आदेश सभी के लिए सबसे ऊपर रहेगा

8. संघ राजनीति में कभी नहीं जायेगा

9. संघ घातक की वापसी संघ में कभी नहीं होगी

10. उपरोक्त 1 से 9 तक के नियम संघ का आधार हैं, ये ना कभी बदले जायेंगे और ना ही कभी ख़त्म किये जायेंगे और ना ही कभी अमान्य किये जायेंगे।


#Education

#Students

#Researchers

#Professors

#Universities

#colleges

#school

#saman

#sangh

#Ambedkar

#scstobcrcm #weekly #Sunday #talk #ism #ego #India #आदिकिसानरिसर्चर

#IamSaman #मैंसमणहूँ

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Sunday, July 21, 2024

The University Truthseeker Society

 विश्वविद्यालय सत्यशोधक समाज

The University Truthseeker Society 

Vishwavidyalay Satyashodhak Samaj 


The University Truthseeker Society is an organization that is committed to the pursuit of truth and justice in the field of education. Some of the key objectives and activities of this organization are:


1. Identifying and exposing corruption, bribery, and injustice in the realm of education and knowledge.


2. Advocating for fairness, transparency, and accountability in the education system.


3. Protecting the interests of students, teachers, and educational institutions.


4. Encouraging and supporting meritorious students and researchers in education and research.


5. Reviewing education policies and programs and demanding reforms.


6. Intervening publicly to bring transparency and accountability to universities and colleges.


7. Supporting student movements and teachers' movements.


8. Raising the issue of discrimination and inequality based on gender, caste, and class in the education sector.


In this way, the University Truthseeker Society plays an important role in bringing reform and cleanliness to the education system. It works to ensure that the pursuit of truth and justice is at the heart of the educational process.


विश्वविद्यालय सत्यशोधक समाज एक ऐसा संगठन है जो शिक्षा क्षेत्र में सत्य और न्याय की खोज करने के लिए समर्पित है। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य और गतिविधियों में शामिल हैं:


1. शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अन्याय को पहचानना और उजागर करना।


2. शिक्षा प्रणाली में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठाना।


3. छात्रों, शिक्षकों और शिक्षा संस्थानों के हितों की रक्षा करना।


4. शिक्षा और अनुसंधान में प्रतिभावान छात्रों और शोधकर्ताओं को प्रोत्साहित और सहायता प्रदान करना।


5. शिक्षा नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा करके सुधार की मांग करना।


6. विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक हस्तक्षेप करना।


7. छात्र आंदोलनों और शिक्षक आंदोलनों का समर्थन करना।


8. शिक्षा क्षेत्र में लिंग, जाति और वर्ग के आधार पर होने वाले भेदभाव और असमानता को उठाकर लाना।


इस प्रकार विश्वविद्यालय सत्यशोधक समाज शिक्षा प्रणाली में सुधार और स्वच्छता लाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


Monday, July 8, 2024

प्रोफेसर विजेंद्र चौहान के बारे में क्या खबर है?


 प्रोफेसर विजेंद्र चौहान

प्रोफेसर विजेंद्र चौहान के बारे में जातिवादी समूह झूठी और भ्रमित करने वाली खबरें चला रहे हैं.

माइथोलॉजी पर लिखने वाले लेखक देवदत्त पटनायक ने अपने एक ट्वीट में कहा हिंदुओं को ब्राह्मणों से हिंदुइज्म को वापस प्राप्त करना चाहिए.

◆◆

इस ट्वीट के जवाब में प्रोफेसर विजेंद्र चौहान ने ट्वीट किया हिंदुओं को पहले अपने धर्म को ब्राह्मणवाद के चंगुल से आज़ाद करने की जरूरत है.

विजेंद्र चौहान ने कहीं भी अपने ट्वीट में किसी जाति का नाम नही लिया. और ना ही धर्म का अपमान किया. ब्राह्मणवाद का अर्थ केवल ब्राह्मण नही है.

◆◆

ब्राह्मणवाद का अर्थ ब्राह्मणवादी अव्यवस्था से है जहां जन्म के आधार पर जाति वर्ण, जातीय भेदभाव और जातीय हिंसा का पालन होता है.

ब्राह्मणवाद के दायरे हर जाति आती है. यहां तक OBC SC ST वर्ग की कोई जाति अगर भेदभाव का पालन करती हैं तो वो जाति भी ब्राह्मणवादी अव्यवस्था की पोषक हैं.

◆◆

प्रोफेसर विजेंद्र चौहान जी बहुजन समाज से हैं इसलिए जातिवादी मानसिकता के लोग उन्हें टारगेट कर रहे हैं.

प्रोफेसर विजेंद्र चौहान ने हिन्दू धर्म में सुधारवाद की बात की है. इस बात का तो स्वागत होना चाहिए.

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इंडिया की किसान ट्राइबल्स जातियों


  इंडिया की किसान ट्राइबल्स जातियों

इंडिया की किसान ट्राइबल्स जातियों में 1990 के दशक के बाद लगातार बिखराव का कारण थाईलैण्डी और चम्पाई साहित्य है ।थाईलेंडियों का सनातनी इतिहास और चंपाइयों का मूलनिवासी इतिहास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।इनका सिर्फ और सिर्फ एक ही मंतव्य है की इंडिया की किसान ट्राइबल्स आपस में लड़ते रहें ।सबसे शानदार बात यह है की सनातनी इतिहास में थाईलेंडियों का कोई रोल नहीं है सिवाय लिखने के , ऐसे ही मूल निवासी इतिहास में भी चंपाइयों का कोई रोल नहीं है सिवाय लेखन के ।

थाईलेंडियों का सनातनी इतिहास आपको इतिहास में लड़ाइयां जीत कर राज करने वाला राजा बना देता है ( अलग अलग किसान ट्राइबल जाती का लग अलग इतिहास जो सिर्फ उसी जाती को पता है )

वैसे ही चंपाइयों का मूलनिवासी इतिहास आप पर इतने ज्यादा अत्याचार करवाता है की आपकी देखने , समझने और सोचने की शक्ति ही ख़तम कर देता है और यह अत्याचार सिर्फ किसान ट्राइबल्स पर ही होते है क्यूंकि मूलनिवासी के हिसाब से चम्पाई तो अभी अवर्ण हो चुके है जबकि पूना पैक्ट इन चंपाइयों ने ही थाईलेंडियों से किया था ।

अब आते हैं ज़मीन पर दिखने वाले इतिहास पर , पूरी दुनिया में यह एक सर्वमान्य तथ्य है की जिस भी जाती या मनुष्यों के समूहों का जिस जमीन पर कब्ज़ा रहा है वह वहां का मूल निवासी और राजा दोनों ही है क्यूंकि ज़मीन पर काबिज़ होने के लिए दिमाग और ताक़त दोनों की ज़रुरत होती है ।

किसान ट्राइबल्स जातियों में आज भी आपसी फैसले करने के लिए जाजम पर सभी बराबर बैठते हैं और सभी को अपनी बात रखने का बराबर का हक़ होता है ।यह प्रथा खुद बताती है की हमारे यहाँ राजशाही कभी नहीं थी सभी गणतांत्रिक गांव थे ।हाँ जब किसी एक कबीले का काबिल आदमी आगे आता था तो बाकि कबीले उस कबीले के साथ एकजुट होकर खड़े हो जाते थे ।इस के उदहारण आज के आधुनिक युग के नेता भी हैं , जैसे एक वक़्त में चरण सिंह और देवीलाल के पीछे सारी किसान ट्राइबल जातियां खड़ी थी ,बाद में राजेश पाइलट , शरद यादव जैसे क़बीलाई नेता हुए ।आज वही जगह राष्ट्रिय स्तर पर लालू प्रसाद और नितीश कुमार की है ।राजस्थान में देखें तो डॉ किरोड़ी मीणा वही जगह रखते है जो कभी नाथूराम मिर्धा की थी ।ऐसा ही कुछ पुरातन काल में हुआ होगा ।

आप अपने गांवों की तरफ देखिये , किसान ट्राइबल्स अपने गांवों और ज़मीनों पर काबिज़ हैं तथा अपने गांव के मामले वहीँ सुलटा लेते हैं और पास के गांव के किसी भी अफेयर में टांग नहीं घुसेड़ते ।ऐसा ही पहले था , यह गांव आज के नए नहीं बसे हुए बहुत पुराने हैं ।

इसी तरह मूलनिवासी वाले अत्यचार की कहानी , अगर पुराने ज़माने में कोई लड़ाई होती भी थी तो पूरी की पूरी ट्राइब को जगह छोड़ कर जाना पड़ता था या उन्हें गुलाम बना लिया जाता था ।जो जातियां अपने गांवों में ज़मीनों पर काबिज़ हैं उन्हें पता होगा की गुलामों को ज़मीन नहीं मिलती है ।न ही कोई ऐसा साक्ष्य है की हम लोग ज़मीन छोड़ कर विस्थापित हुए हैं ।हाँ यह ज़रूर सच है की यह थाईलैण्डी और चम्पाई हर इलाक़े में भूमिहीनों की तरह मौजूद है , यह अकेला साक्ष्य ही काफी है यह बताने के लिए की यह लोग इंडिया में रोज़ी रोटी के लिए शरणार्थी के तौर पर आये थे ।

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समण आदिकिसान कॉन्सेप्ट


समण आदिकिसान कॉन्सेप्ट

समण आदिकिसान कॉन्सेप्ट पर कोई सवाल नही बनता है और जो सवाल जवाब कर रहे है वो इस कॉन्सेप्ट से पुर्णतया अनभिज्ञ है क्योकी यह कोई रद्दी मे बिकने वाली किताबो के पन्नो मे लिखा कॉन्सेप्ट नही है।

यह कॉन्सेप्ट हमारे आसपास बिखरे पङे सबुतो व तथ्यों पर आधारित है। आप इसे परखना चावोगे तो हर एंगल से खरा पावोगे। जिन लोगो को अपनी दुकाने बंद होती दिख रही है वो लोग दिनरात समाज के लोगो को बरगलाकर अपनो के सामने खङा करने के कोशिश कर रहे है।

अक्षर ज्ञानीजनों को हर बात किताबों में लिखी हुई चाहिए जबकि

ज़मीन से जुड़े हुए लोग जब किताबों में लिखी बातों का सत्यापन करते हैं तो झोल समझ नहीं आता

इसलिए आदिकिसान विचारक कलम की धार से जो फर्जी मशीहा अंग्रेज हमारे समाजों पर थोप रखें हैं उनको लेकर सवाल खड़े करता है

किताबी लोग तिलमिला जातें हैं अरे भैया ऐसे काम नहीं चलेगा सवाल खड़े करने दो ताकि तर्क वितर्क में और भी सच्चाई सामने आ सकें अगर तुम्हारा मशीहा वाकई काबिले के प्रति कृतसंकल्पित रहा है

बिना कंट्रोल रिमोट खुद के विज़न के साथ तो हम भी उसे स्वीकार करेंगे लेकिन सवाल तो करने दो???

#जोहार 

भारत का पहला प्रिंटिंग प्रेस कब और कहाँ पर खुला

भारत का पहला प्रिंटिंग प्रेस कब और कहाँ पर खुला?


1674–75 में देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस गोवा में खोला गया था जिसमे केवल बाइबिल की पुस्तक छपती थी।


भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस कहां स्थापित हुई थी?

भारत में प्रिंटिंग प्रेस का प्रचलन करने वाला प्रथम व्यक्ति कौन था?

पहला प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने क्या था?

प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया?

15 वीं सदी में यूरोप में शब्द जब मुद्रित हुआ तो उसने मनुष्य की दुनिया को हमेशा के लिये बदल दिया। एक नए समय ने जन्म लिया। सामान्य जन तक पुस्तकों का प्रसार, स्वतंत्रता का बोध और लोकतांत्रिक चेतना का उदय। रोमन सम्राज्य में जर्मन जोहन्स गुटेनबर्ग ने 1440 में प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया था और उसी के साथ यूरोपियन रेनेसां और आधुनिक युग का उदय हुआ था।


भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस


चकित कर देता है यह जानना कि हमारे इस बम्बई शहर में भी पहला प्रिंटिंग प्रेस 17वीं सदी में ही स्थापित हो गया था और वह भी एक भारतीय द्वारा। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी का कारोबार अभी यहां ठीक से फैला नहीं था। इस शहर में बीते समय के किस्से बिखरे पड़े हैं लगभग रहस्य कथाओं की तरह।


बम्बई में यह प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक व्यापारी ने लगाया था। सूरत निवासी भीमजी पारिख के भीतर एक नये युग का सपना था और एक अद्भुत जुनून। उनकी यह कहानी खासी दिलचस्प है। यह सच है कि बम्बई में इस प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना से पहले 16वीं सदी में भारत के तटीय इलाकों में ईसाई धर्म प्रचारकों के मार्फत मुद्रण टेक्नोलॉजी का प्रवेश हो चुका था पर उनके उद्देश्य दूसरे थे। ये ईसाई धर्म प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिये बाइबिल की छपी हुई प्रतियां लेकर यहां आते थे। गोवा में उन्होंने देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस जरूर खोला पर केवल बाइबिल की प्रतियां छापने के लिये। भीमजी पारेख ने बम्बई में 1674-75 में जब अपना प्रिंटिंग प्रेस खोला तो उनका वह प्रेस अपनी परंपरा की स्मृति और सामूहिक बोध के प्रसार के लिये एक नए युग की वास्तविक शुरुआत थी। यह उल्लेखनीय है कि अभी किताबें छपनी शुरू नहीं हुई थीं। भारत में किसी समाचार पत्र की शुरुआत भी अभी नहीं हुई थी।


भीमजी पारेख ने अपनी छापेखाने की यह मशीन यूरोप से आयात की थी। वे उसे सूरत में लगाना चाहते थे। इतिहासकार मकरंद मेहता अपनी पुस्तक 'इंडियन मर्चेंट ऐंड इंटर्प्रिनर्स इन हिस्टोरिकल पर्सपेक्टिव' में लिखते हैं कि 'भीमजी पारेख ईस्ट इंडिया कंपनी के लिये एक कमीशन एजेंट थे और सिक्कों के विनिमय का कारोबार करते थे। कंपनी ने उनकी सेवाओं से प्रभावित होकर उन्हें एक मैडल और सोने के चेन भी प्रदान किए थे, जिसकी कीमत 1683 में 150 शिलिंग थी।'


ईस्ट इंडिया कंपनी का हेड क्वार्टर तब सूरत में था। सूरत मुगल शासन के अधीन था और ओरंगजेब द्वारा गैर-मुस्लिमों पर लगाये गए जजिया कर से सूरत के व्यापारी परेशान थे। 1674 में भीमजी पारेख 800 हिंदू और जैन बनियों के एक दल को लेकर सूरत छोड़कर बम्बई चले आए। उन्हीं दिनों गेराल्ड औंगियार को ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1675 में सूरत की फेक्टरी का अध्यक्ष और बम्बई का गवर्नर नियुक्त किया था। उसी दौर में बम्बई का टापू एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हो रहा था। औंगियार ने सूरत के व्यापारियों और कुशल कारीगरों को धंधे-व्यापार के लिये बम्बई आकर बसने का न्यौता दिया था। परिणामस्वरूप बहुत सारे पारसी, अर्मेनियन, बोहरा, यहूदी, गुजराती और जैन बनिये और ब्राह्मण सूरत और दीव से बम्बई चले आये थे। बम्बई का एक बहु सांस्कृतिक स्वरूप उभरने लगा था। अंग्रेज गवर्नर ने डोंगरी से लेकर मेंढम्स पॉइंट (वर्तमान में लॉयन गेट) तक के इलाके को एक दीवार से घेरने की विस्तृत योजना बनाई। भारत में यह आधुनिक नगरीकरण का पहला प्रयास था। इसी के साथ इस शहर में बड़े भवन बनने लगे। बंदरगाह विकसित हुआ। 1670 में औंगियार के प्रयासों से ही पहली बार बम्बई में टकसाल स्थापित हुई।


जे. बी. प्रिमरोज 'ए लडंन प्रिंटर्स विजिट टू इंडिया इन सेवेन्टींथ सेंचुरी' में लिखते हैं कि भीमजी पारेख ने बम्बई प्रांत के तत्कालीन गवर्नर गेराल्ड औंगियर से यह अनुरोध किया था कि वे छपाई की मशीन के साथ एक ऐसा विशेषज्ञ भी यहां बुलाना चाहते हैं जो ब्राह्मी लिपि (आधुनिक देवनागरी) के मैटर को छाप सके और वे इसके लिये उस विशेषज्ञ को तीन वर्षों तक सालाना 50 पाउंड का पारिश्रमिक देने को तैयार हैं।'


भीमजी के अनुरोध पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने हेनरी हिल्स नामक एक मुद्रण विशेषज्ञ को यहां बुला भेजा। ब्राह्मी लिपि के लिये टाइप अक्षरों को गढ़ने का काम शुरू हुआ। हालांकि हेनरी विल्स के पास भारतीय लिपि में टाइप फॉन्ट काटने की पूरी निपुणता नहीं थी। भीमजी ने इसके लिये कंपनी से अक्षरों की कास्टिंग करने वाले टाइप फाउंडर को मंगवाने का अनुरोध किया। वे ब्राह्मी लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, पांडुलिपियों को ताड़पत्रों की कैद से निकालकर कागज की दुनिया में उतारना चाहते थे। इधर कंपनी को यह लगता रहा था कि भीमजी बाइबिल की प्रतियों को अपने यहां देवनागरी में छापेंगे और ईसाई धर्म के प्रचार मे मदद देंगे। बम्बई में यह दो सांस्कृतिक परिवेशों का पहला टकराव था। एक विवाद पैदा हो गया। हेनरी हिल्स काम अधूरा छोड़ कर लौट गया। भीमजी पारेख ने करारनामा तोड़ने के आरोप में उस पर कानूनी मुकदमा दायर कर दिया। कंपनी ने उसकी जगह दूसरे किसी विशेषज्ञ को बुलाने का कोई इंतजाम नहीं किया। इंग्लैंड से अक्षरों की कास्टिंग करने वाला कोई टाइप फाउंडर यहां नहीं आया। भीमजी ने स्थानीय लोगों से यह काम करवाने की कोशिशें कीं पर परिणाम संतोषजनक नहीं थे। इन लोगों को इस काम का कोई अनुभव नहीं था। पारेख मृत्यु पर्यंत देवनागरी में छपाई शुरू करने के इस अभियान में लगे रहे। तरह-तरह के अवरोधों से लड़ते रहे। उन्होंने अपना बहुत सारा धन भी इस पर खर्च कर दिया था पर उनका वह सपना पूरा नहीं हुआ। मकरंद मेहता अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि योरोपीय लोग यहां स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित करना ही नहीं चाहते थे। वे जानते थे कि यदि ऐसा करेंगे तो उन्हें देसी प्रतिभा से स्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ब्राह्मी लिपि में भारतीय ग्रंथों को छापने का भीमजी का वह सपना उनके जीवन काल में अधूरा रह गया। अलबत्ता रोमन लिपि में बहुत सारी चीजें इस प्रेस में मुद्रित होती रहीं।


1680 में भीमजी मेहता के निधन के कई वर्ष बाद अंग्रेजी के टाइपोग्राफर और भारतविद चार्ल्स विल्किन्स ने देवनागरी के फॉन्ट बनाये और 1805 में जो पहली पुस्तक देवनागरी में मुद्रित हुई वह 'भगवत गीता' थी। आज हम एक डिजिटल युग में हैं। साइबर संस्कृति और पेपरलैस कामकाज के इस जमाने में आज की युवा पीढ़ी को छापेखाने और टाइपसेट फाउंड्री की वह संस्कृति, उसके लिये किया गया संघर्ष और मुद्रित शब्द का वह पुराना दौर शायद एक मिथकीय समय लगे। लेकिन आरम्भिक वुडब्लॉक प्रिंटिंग से लेकर मेटल टाइप, रोटरी प्रेस, लिथोग्राफी, ऑफसेट प्रिंटिंग, स्क्रीन प्रिंटिंग, लेजर प्रिंटिंग तक होते हुए आज डिजिटल प्रिंटिंग और थ्री-डाइमेंशन प्रिंटिंग तक पहुंची हमारी यह यात्रा सभ्यता, नगरों के विकास, संस्कृतियों के बदलाव और कार्य शैलियों में उलटफेर की यात्रा भी है। भीमजी पारेख की तरह की कितनी ही गाथाएं इसमें छिपी हुई हैं।


पोस्टमार्टम:-

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यह अपने कहाँ से उठा लिया है। अधिकांश वाक्य केवल दम भरने वाले और विरोधभाषी है।

जैसे

1. शुरू में कुछ देर तक लेख दावा कर रहा है कि पहला प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक भारतीय ने खोला, पर छठे पैराग्राफ में कह रहा है कि "यह सच है कि......"। ज्ञात हो कि भारत मे पहला प्रिंटिंग प्रेस लगभग 200 साल पहले सन 1500 में आ चुका था

2. इस लेख में भीमजी पारेख के नए युग का सपना, अद्भुत जुनून, परंपरा की स्मृति, सामूहिक बोध का प्रसार आदि खूब गैस भरा है। लेकिन जब भारत के इतिहास के रचयिता ही अँग्रेज थे तो कौन सा इतिहास, कौन सी परम्परा और उन्हें पढ़ते कौन लोग, 1870 में साक्षरता दर ही 3% थी। यह भी की ये 3% भी फ़ारसी उर्दू वाले ही थे। हिंदी अभी बनी नही थी, संस्कृत इस देश मे आयी नही थी। 50 साल पहले तक तो उर्दू जानने, पढ़ने, लिखने वालों खासकर कायस्थों(बस अँग्रेजों, मुगलों के साथ आये लोग, बाकी 98% जनता को कोई मतलब नही था) की बहुत पूछ थी, क्योंकि उर्दू के पहले भारत मे भाषाएँ तो थी, कोई स्क्रिप्ट ही नही था (ब्राम्ही, देवनागरी कुछ नही, लिखने पढ़ने का कोई चलन ही नही था)

3. कृपया ब्राम्ही लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, ताड़पत्र वाले पांडुलिपियों के भारत मे कहीं मिलने के सबूत पेश कीजिये

4. दो सांस्कृतिक परिवेशों का टकराव अच्छी सनातनी भावना जगाता है और पारेख जी को सावरकर की तरह देशभक्त साबित करता है। करारनामा के विवाद का टकराव संस्कृति का टकराव हो गया!

5. पारेख मृत्युपरांत देवनागरी में छपाई में लगे रहे, uhhh! लेखक को लिखते समय थोड़ा विवेक बरतना चाहिए। यदि यह typo मान भी लिया जाए तो प्रेस शुरू करने में ही पारेख जी को तकनीकी दिक्कत आ रही थी, लेकिन वे देवनागरी(1796 में बनी) में छपाई शुरू कर दिए

6. यदि यूरोपियन लोग स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित नही करना चाहते तो वे पारेख को प्रेस बैठाने में इतना जद्दोजहद ही नही करते। देशी प्रतिभा से यूरोपियन लोगों को प्रतिस्पर्धा का डर था, एक दम हास्यास्पद बात है। 

7. रोमन लिपि में उनके प्रेस से बहुत सारी चीजें मुद्रित हुईं। ज्ञात हो कि उनके प्रेस से किसी भी लिपि में छपी एक भी पुस्तक का कहीं कोई रिकॉर्ड नही है


कुछ और बातें! यहाँ हिन्दू लोग कौन हैं, अच्छा विवरण दिया है।


जॉन गिलक्रिस्ट ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम्स में बैठकर 1796 में अपने supervision में देवनागरी बनवाया। तब जाकर 1805 में अंग्रेजों द्वारा बैठाए गए प्रेस "गीता प्रेस" से गीता छपी और अँग्रेजों तथा भारत सरकार के अथक प्रयास और अरबों खरबों रुपया बहाने के बाद भी 200 साल के बाद 2011 की जनगणना के अनुसार मात्र 26.11% लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करते हैं

~राहुल पटेल

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Thursday, July 4, 2024

समणवाद बनाम वमणवाद

 समणवाद बनाम वमणवाद


कोई व्यक्ति जो समण है और समण लोगों के सुख सुविधा, सुरक्षा व विकास के उद्देश्य के साथ, सेवा करता हैं, तब इस क्रिया को समणवाद कहते हैं। यदि कोई व्यक्ति जो वमण है और समण लोगों के सुख सुविधा, सुरक्षा व विकास की बात करता है या उनकी सेवा करना चाहता है या कुछ खैरात देना चाहता है, तब उस व्यक्ति से यह पूछना चाहिए कि समणों को इस दयनीय हालत में पहुंचाने वाले कौन लोग हैं? यदि वमण ही हैं तब वह वमण व्यक्ति पहले अपने वमणों को जाकर समझाए और कहे कि वे जल, जंगल, जमीन, नौकरी, कोठी, बंगला, फैक्ट्री, बैंक बैलेन्स, सोना चांदी, मोटरकार, अच्छा मेवायुक्त दूध दही का भोजन, ऐशो आराम समणों में अपने बराबर बांटे। अन्यथा वह व्यक्ति सेवा के नाम पर धोखा दे रहा है और यही वमणवाद है। वमण बातें खूब अच्छी-अच्छी करेगा पर समण को कुछ देगा नहीं। इसलिए वमण से बात करके समण अपना समय खराब न करें। सभी समण अपने काम से काम रखें।

अब हम क्या है समण या वमण

 




समण वे लोग हैं जो सम विधान बनाते हैं।
समण वे लोग हैं, जो समता, समानता की नीति बनाते हैं, लागू करते हैं और उस नीति पर जीवन यापन करते हैं। समण वे लोग हैं जो सम बन्धन बनाते हैं और जीवन भर निभाते हैं। समण वे लोग हैं जो सम आचरण करते हैं। समण वे लोग हैं जो अपने समणों को सम मान (सम्मान/समान) भाव से देखते हैं। समण वे लोग हैं जो सम मिलन (सम्मेलन/सन्निपात बहुल) करते हैं। समण वे लोग हैं जो सम अधिकार देते हैं व लेते हैं। समण वे लोग हैं जो समाधि में ध्यान लगा कर जीवन यापन करते हैं। समण वे लोग हैं जो समाधान देते हैं। समण वे लोग हैं जो सम आदान (समादान/स्वीकार) करते हैं। समण वे लोग हैं जो सम आगम (समागम) करते हैं। समण वे लोग हैं जो संग (साथ-साथ) जीते हैं व मरते हैं। समण वे लोग हैं जो समज्ज (मेले) लगाते हैं। समण वे लोग हैं जो सम चरिया (शान्त रहने की चरिया) करते हैं। समण वे लोग हैं जो समग्गाराम (साथ-साथ रह कर खुश रहना/संयुक्त परिवार) का गुण रखते हैं। समण वे लोग हैं जो सम चित्त (शान्त चित) रखते हैं। समण वे लोग हैं जो अपने आप को समता से धारण करते हैं जिन्हें साधु, साध्वी, समणी, समणा, भिक्खु, भिक्खुणी कहते हैं। समण वे लोग हैं जो समथ भावना (शान्ति भावना) करते हैं। समण वे लोग हैं जो समुदायों में आते जाते हैं। समण ही सम॰॰ाा हैं सम॰॰ाा जो नाग सद्द का परियाय (पर्यावाची) है।

समणों की कथा अनन्त है। किसी को नहीं पता कि पहला समण कौन था? कहां रहता था? ये अनन्ता कथा अपना इतिहास बुद्ध के समय से बताती है। जब लोग बुद्ध को महासमण कह कर सम्बोधित करते हैं। धम्म चक्क वति सम रट्ठ असोक महान पिय दस्सी राजा के द्वारा लिखवाई पत्थरांे की किताब से यह समण कथा बाहर निकलती है। समन महापुरिसांे की (पुरिस = नर, नारी) अनन्त जानी अनजानी कथाऐं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज होने से रह गई परंतु लोक कथाओं, लोक गाथाओं, लोक गीतों में व लोक उस्सवों में आज भी जीवित हैं। वे समण राजाओं के असीम सोरय की कथाएं, जिनकी गुंज अन्तलिक्ख में तैर रही हैं। वो जीवक महान समण दुनिया के डॉक्टरों का गुरू जो खोपड़ी खोलकर आपरेशन करता था और मरीज को चारपाई से बांध देता था। वो समण सुदत्त व्यापारी जिसे दुनिया अनाथपिण्डक के नाम से जानती है, जिसका व्यापार दुनिया में फैला था। जिसे सोने के सिक्के बिछाकर जेत राजकुमार को अपना आराम (बगीचा) बेचने पर मजबूर किया। जो गरीबों, लाचारों, बीमारों, मुसाफिरांे को भोजन दान करता था। वो समण चन्द्रगुप्त मोरया जिसके दरबार में विदेशी अपना दूत रखते थे। समण सन्त रविदास जी, समण कबीर साहब, समण नारायण गुरू, समण गुरू चांद ठाकुर, समण गुरू हरिचाँद ठाकुर, समण चोखा मेला, समण गुरू घासीदास, समण गुरू दुर्बलनाथ, समण गुरू गरीब दास, समण अच्छुुतानन्द हरिहर, समण अयोति दास, समण लेखराज सिंह, समण चिम्मनदास, समण वीरा पासी, समण राजा बिम्बसार, समण सन्त जगनाडे महाराज, समण सन्त गोरा कुम्भकार, समण मातादीन, समण दीनाभाना, समण डी. के. खापर्डे, समण दशरथ मांझी, समण कर्पूरी ठाकुर, समण महाराजा गुहराज निषाद, समण महाराज भागीरथ सैनी, समण महाराज शूर सैन, समण सन्त सेवा लाल महाराज बंजारा, समण वीरांगना अवंती बाई लोधी, समण ऊदा देवी, समण सन्त तिरूबल्लवर, समण झलकारी बाई, समण नंगेली, समण वेलावाडी मल्लमा, समण महाराज सातन पाली, समण ललई सिंह यादव, समण डॉ. राम स्वरूप वर्मा, समण ज्योतिबा फुले, समण बिरसा गुण्डा, समण माता सावित्री बाई फुले, समण थनथाई पेरियार ई. वी. रामास्वामी , समण उधमसिंह, समण माता रमाई अम्बेडकर, समण साहू जी महाराज, समण शिवाजी, समण सन्त गाडगे बाबा, समण गुरू नानक, समण सन्त तुकाराम, समण सन्त सेना जी, समण मातादीन, समण दीनाभाना, समण झलकारी बाई, समण भगत सिंह, समण उधम सिंह, समण फूलन देवी, समण फातिमा शेख, समण अन्ना भाऊ साठे, समण नारायण गुरू, समण संभाजी महाराज, समण साहू महाराज, समण जीजा माता, समण अहिल्याबाई होल्कर, समण तन्त्या भील, समण सन्त जगनाडे, समण सन्त जनाबाई, समण सन्त वीर मेघमाया, समण सन्त रामदेव पीर, समण सन्त नामदेव, समण सन्त सावता माली, समण सन्त नरहरी सोनार, समण सन्त तुकडोजी, समण सन्त बसवेश्वर लिंगायतऐ, समण सन्त गुलाब राव, समण ठाकुर पंचानन वर्मा, समण राईचरण सरदार, समण अनुकूल नस्कर, समण सिंदु, समण कानहूँ, समण सम्राट अशोक, समण सम्राट महापदमानन्द, समण सम्राट हर्ष वर्धन व अन्य लाखों समण महापुरूष व महिलाएं।

समण भवन, समण थूप (स्तूप) समण पसादा, समण डेरे, समण विहार, समण 84000 निम्मान, विहार, मनदर, चिकित्सालय (विचिकिच्छालय), प्याऊ, उत्सव, मेले, गंगा स्नान, गढ़, गढ़ी, वप्प मंगल उस्सव, ध॰॰ा तेणस, पकास उस्सव, नाग प॰॰ामी, तीहार, जात-दिवस उस्सव, छत्त मंगल उत्सव, मंगल दिवस, परिणय उस्सव, परिणय मंगल संखार, कण्ण विज्झन संखार (कर्ण वेधन), मंगल मुहुत्त, सिस्स मुण्डन संखार, मच्चु संखार, सामणेर संखार, बाल मुण्डन संखार (बाल से ही बालक पड़ा), वेसाख पूरणमासी, आसार पूरणमासी, (बुद्ध पूरणमासी), नच्च उस्सव गीत वादक, समण लोकगीत, समण जातक कथाऐं, समण कहानियां, समण नाटक, समण छन्द, समण सुत्त, समण इतिहास।

करोडांे-अरबांे समणों की धरती है, यह भारत जिसे सम्राट असोक ने महा पराक्रम से जीत कर महाभारत बनाया था। महाभारत किसी पुस्तक का नाम नहीं है। वरन महाभारत समण सम्राट असोक के द्वारा सेंकडों युद्धों को जीतकर बनाया विशाल, ब्रहद, महाभारत भूभाग है।

समण की महान सभ्यता, जिसे पुरानी भासा में नागरिकता कहते है, यही महान समण लोग पुराने नागर, नाग, नागरिक, नागा, नागों है इस महान समण धरती के।

कौन जात हो?

 ‘‘आप कौन जात हो?’’

आप कि


स जाति से हो? कौन जात हो? आपकी जाति क्या है? आपका पूरा नाम क्या है? आप क्या काम करते हो? आप किस मौहल्ले के रहने वाले हो? क्या आप रिजर्व कैटेगरी से हो ? आप किस पार्टी के समर्थक हो? आप ज्योतिबा फुले को मानते हो क्या? आप डॉ. अम्बेडकर के समर्थक हो क्या? ये वो प्रश्न है जो भारत में रोज करोड़ांे बार समणों से पूछे जाते हैं? जब भी कोई व्यक्ति ये प्रश्न करता है, तब वह सामने वाले की पहचान जानना चाहता है। भारत में एक व्यक्ति की निम्नलिखित आठ प्रकार की पहचान होती है।

1. पारिवारिक, गोत्त, कुल सम्बन्धी पहचान: चाचा-चाची, बब्बी, बुई, बुआ, ताऊ-ताई, दादा-दादी, नाना-नानी, भाई-बहन, बेटा-बेटी, पिता-माता, पोता-पोती, नवासा-नवासी, मौसा-मौसी, फूफा-फूफी, भतीजा-भतीजी, भांजा-भांजी, भाभी आदि आदि। मोरया गोत्त, गोतम गोत्त, सिंह गोत्त आदि।

2. काम, कार्य, कम्म, जाति, जात, जातिगत पहचान का अर्थ क्या है?

अहीर एक जाति का नाम है। यह पुराने सद्द अर॰॰ा (अरई) से बना है। अर॰॰ा का अर्थ है जंगली, अरण्य। जो व्यक्ति जंगल में निवास करता था, उसे अर॰॰ावासिक कहते हैं। जो अर॰॰ा में विहरता है, उसे अर॰॰ाविहारी या अर॰॰ाविहारिक कहते हैं। इसी अर॰॰ा विहार से घटते घटते सद्द बना अर॰॰ाहारी या अरहारी या अरहीर और अन्त में अहीर। अब अहीर एक जाति है। अर॰॰ाा या औरैया अब एक जिला है। एक बड़े से जंगल को अर॰॰ाानी कहते हैं।

रजक अब एक जाति है, जो कपडों का मल धोती है। ये वे लोग हैं जो अरजक थे। रज का अर्थ है मल/मैल।  अरज का अर्थ है मल रहित।  अरजक का अर्थ है वे लोग जिनके मन के मल/मैल धो डाले गये हैं। वे उँचे और महान लोग थे। जिनके मन में कोई मैला नहीं होता है, वहीं, अरजक आज के रजक या धोबी हैं।  अब धोबी एक जाति है। मन का मल धोना अब एक जाति है।

फूल-माली-फूलों को तोड़ना, माला बनाना, अब एक जाति है। माली, माला, फूले अब काम नहीं, एक जाति है।

सेन/सेनक बाज को कहते हैं। जो बाज की तरह हमला करता है उसे सेनी/सैनी कहते हैं। सेनी से सेना, सैनिक/सेनिक, सेनिय, सेनापति, सेनानी बना। सेनी अब एक जाति है।

ध॰॰ा - चावल, दाल, गेहूँ, बाजरा आदि फसल के दानों को बोलते हैं। ध॰॰ा से धान सद्द बना। धान उगाने वाले को, बेचने वाले को, रखने वाले को धानुक कहते है, धानुक अब जाति है।

सांप पकड़ने वाला सपेरा

लोहा पीटने वाले को लोहार

सोना पीटने वाले को सुनार

खेत जोतने वाले को खत्ती/खत्री

कपडा बुनने वाले को बुनकर

नाव चलाने वाले को नाविक

छापने वाले को छैपी/छिम्बा

आराम पालन वाले को  आरामपाल (पाल) (आराम = बाग)

पसु पालने वाले को पाल/पसुपाल

लिखने वाले को लेखपाल

कट्ठ बनाने वाले को कट्ठकार

वान बनाने वाले को वानकर

भय अन्त करने वाले को भन्ते

भय का दन्त करने वाले को भदन्त

भय का चक्खु दस्सन कराने वाले को भिक्खू

राज्य चलाने वाले को राजा

सवाल को बुझाने वाले को बुज्झ (बुद्ध)

मतलब जो व्यक्ति जो भी काम करता था, वो जो भी उत्पन्न करता था, वो ही उस व्यक्ति की जाति/ जात/उत्पन्नता का नाम पड़ गया। 

जैसे आज आधुनिक नाम है डॉक्टर, इन्जीनियर, कम्प्यूटर आपरेटर, लिफ्ट आपरेटर, अर्किटेक्ट, ड्राईवर, शैफ, मैनेजर, प्रिन्टर, कटर, स्वीपर, ड्राई क्लीनर, शॉप कीपर, पुलिस, आर्मी, जज, वकील, सरकारी कर्मचारी, प्राइवेट कर्मचारी, प्।ैए प्च्ैए प्थ्ैए प्म्ैए प्ज्ैए डठ।ए ब्। ये सभी काम हीं हैं। अब हम इनको अलग भाषा में बोलते हैं। पर ये आज के हिसाब से पुरानी जात और जातियां ही हैं। बस नाम बदल गये हैं पर काम की उत्पत्ति नहीं बदली है।

मतलब साफ है यदि आप कोई काम करते हैं तब वह काम आपकी पहचान है। लोग आपको आपके काम से जानते हैं। पुलिस वाला, चायवाला, पन्चरवाला, सब्जीवाला, दुकान वाला, खेतवाला, बसवाला, आदि। यही सारे काम आपकी जात/जाति हैं। आपकी पूर्व काम की पहचान है। जात/जाति का पुरानी भासा में अर्थ है ‘उत्पन्न’। आप अपने काम के द्वारा जो उत्पन्न करते हैं वही आपकी पहचान थी।

पुरानी भासा में बुद्ध ने बताया कि चार पकार के दुख होते हैं जो मनुस्स के साथ रहते हैं।

1.  जाति दुख - मनुस्स का उत्पन्न होना दुख है।

2.  जरा दुख - मनुस्स का बूढा होना दुख है।

3.  व्याधि दुख - मनुस्स का बीमार होना दुख है।

4.  मरणं दुख - मनुस्स का मृत्यु होना दुख है।

यहां यह बिल्कुल साफ है कि जाति का अर्थ उत्पन्न होना, पैदा होना, जन्म लेना है। 

आज भी हम आम बोल चाल में कहते हैं कि यह नवजात है या नवजात बच्चा है या उसका नवजात बच्चा और जच्चा दोनों सलामत हैं। नवजात का अर्थ है नया उत्पन्न या नया पैदा हुआ बच्चा। जच्चा का अर्थ है नवजात को जनने वाली माँ।  

आप किसी भी सन्दर्भ में देख-परख लीजिए, जात और जाति का अर्थ पैदा होना, उत्पन्न होना, पैदा करना, उत्पन्न करना, जन्म होना, बनाने से ही सम्बन्धित मिलेगा।

जो मनुस्स कुछ पैदा नहीं करता है, कुछ बनाता नहीं है, कुछ उत्पन्न नहीं करता है, कुछ काम नहीं करता है, उसका जात/जाति ना पहले होता था, ना ही आज होता है। जो याचना करता है, जो भीख मांगता है, जो बाहर से आया है उसका जात या जाति ना पहले था, ना ही आज है। वमण का उदाहरण देखें, वमणों में कोई जात/जाति नहीं होता है।

वमणों में जाति/जात नहीं होती है, क्योंकि वे कुछ काम ही नहीं करते हैं। वे कुछ उत्पन्न ही नहीं करते थे। ठीक इसी प्रकार पहले के समय समणों में भी जाति/जात नहीं होती थी। क्योंकि समण लोग अपना काम बदलते रहते थे। एक बाप के चार बेटे, एक बेटा खत्ती जो खेत पर काम करता है। एक बेटा अर॰॰ा-विहारी जो अर॰॰ा (जंगल) में काम करता है, उसे अहीर कहते है। एक चम्मकार जो चाम की पानी की मश्क बनाता है। एक बेटा पशुपालक जो पशुओं को पालता है। वह पाल हो गया। तब आप उनकी एक जाति/जात कैसे कह सकते हैं। एक पिता की चार सन्तान चारों अलग-अलग उत्पन्न कर रहे हैं। चार जात/जातियां।

इससे यह साफ होता है कि दुनिया में कार्य की पहचान है। अंग्रेजी में ळवसक ेउपजीए प्तवद ेउपजी कहते हैं। भारत में सुनार, लोहार कहते हैं।

यदि आपका काम बदल जाता है तो आपकी जाति/जात भी बदल जाती है। यदि आप बदलना चाहे तब।

3. धर्म/धम्म/मजहब/ रिलिजन/ मत की पहचान: दो तरह के लोग रहते हैं दुनिया में, धम्मिक या अधम्मिक। संस्कारित भासा में धार्मिक या अधर्मी। बस यही दो बातें हैं। यदि आप धम्मिक/धार्मिक/ मजहबी/रिलिजियस हैं तब आप किसी व्यक्ति के मत को या व्यक्ति के द्वारा खोजे गये प्राकृतिक मत को, किसी सन्त के मत को या किसी समुदाय के मत को या ळवक के मत को मानते हैं और यदि आप धम्मिक नहीं है, तब आप अधम्मिक/अधर्मी हैं। जिसे आज की भासा में नास्तिक कहते हैं।

यदि आप किसी धम्म/धर्म को नहीं मानते हैं तब आप को अधम्मिक/अधर्मी बोला जायेगा।

यदि आप किसी मान्यता को मानते हैं तब आपको उस मान्यता के नाम की पहचान मिलेगी।

जैसे- यदि आप मौहम्मद साहब की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान मुसलमान होगी, यदि आप बुद्ध की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान  बुद्धिस्ट/बौद्ध/बोध होगी, यदि आप महावीर जैन की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान जैनी होगी, यदि आप गुरू रविदास की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान रविदासी होगी, यदि आप गुरू कबीर साहब की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान कबीर पन्थी होगी। ऐसी 4000 से भी ज्यादा मान्यतायें हैं जिनको लोग मानते हैं, कभी इन मान्यताओं को छोड़ देते हैं, कभी इन मान्यताओं को बदल लेते हैं।

भारत के समविधान में यह व्यवस्था है कि आप सुबह को इसाई मत को मानें, दोपहर को सिख मत को मानें, शाम को बौद्ध मत को मानें, रात को जैन मत को मानें, आधी रात कोे मुसलिम मत को मानें, फिर सुबह कबीर मत को मानंे, दोपहर रविदासी मत को मानें, शाम को गुरू घासीदास मत को मानंे, रात को गुरू हरिचाँद ठाकुर मत को मानें। इसका अर्थ यह है कि मनुस्स की धम्मिक/धार्मिक पहचान निरन्तर बदलती रहती है।

कांशीराम जी के मत को मानने वाले लोग 15 मार्च 1934 से पहले नहीं थे। तब वो कांशीराम जी के मत को नहीं मानते थे। किसी अन्य मत को मानते होंगे या किसी भी मत को नहीं मानते हांेगे। क्योंकि पीर फकीर समण सन्त मान्यवर कांशीराम जी 15 मार्च 1934 में पैदा हुये थे। उससे पहले पीर फकीर समण सन्त मान्यवर कांशीराम जी का अत्थितत्त (अस्तित्व) भी नहीं था।

कोई जो आज विश्वरत्न डॉ. अम्बेडकर का मानने वाला है, वह 14 अप्रैल 1891 से पहले डॉक्टर अम्बेडकर के मत को नहीं मानता था। किसी अन्य मत को मानता था। क्योंकि 14 अप्रैल 1891 से  पहले  डॉ.  अम्बेडकर का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।

कोई जो आज महामना राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले, माता सावित्री बाई फुले के मत को मानता है वह 11 अप्रैल 1827 से पहले उनके मत को नहीं मानता था। क्योंकि उनका जन्म ही 11 अप्रैल 1827 में हुआ था। 11 अप्रैल 1827 से पहले आपको कोई भी सत्य शोधक समाजी नहीं मिलेगा। जो आज सत्य शोधक समाजी मत का है वह 11 अप्रैल 1827 से पहले किसी और मत को मानता होगा। क्योंकि 11 अप्रैल 1827 से  पहले  महामना राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।

कोई जो आज सिख मत को मानता है वह लगभग 500 साल पहले तक सिख मत को नहीं मानता था। भारत में, दुनिया में 500 साल पहले तक कोई सिख मत का बन्दा नहीं था। जो आज सिख मत में है, वे 500 साल पहले किसी और मत को मानते होगें। क्योंकि आज से 500 साल पहले सिख मत का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।

कोई जो आज गुरू रविदास मत को मानता है, कबीर मत को मानता है या अन्य सन्त मतों को मानता है, ये सभी सन्त, गुरू 700 साल पहले तक नहीं थे। जो अब इन मतांे को मानता है वह पहले किसी और मत को मानता था। क्योंकि आज से 700 साल पहले गुरू रविदास का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।

कोई जो आज मुसलिम मत को मानता है, वह 1454 साल पहले किसी और मत को मानता था क्योंकि मौहम्मद साहब का जन्म आज 2024 के हिसाब से 1454 साल पहले हुआ था। जब मौहम्मद साहब की पैदायश ही 1454 साल पुरानी है तब उनके मत को मानने वाले उस तारीख से पहले हो ही नहीं सकते हैं। तो जो आज भारत में मुसलिम लोग हैं वह 1454 साल पहले किसी और मत को मानते होंगे। जो कोई आज इसाई मत को मानते हैं वह 2024 साल पहले किसी और मत को मानते होगंे। क्योंकि आज से 1454 साल पहले मौहम्मद साहब का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।

ठीक इसी प्रकार जो लोग आज बुद्ध मत को या जैन मत को मानते हैं वे 2600 साल पहले किसी और मत को मानते होंगे। वे लोग 2600 साल पहले ना बुद्धिस्ट होंगे और नाही जैनी हांेगे।

इसका मतलब साफ है कि व्यक्ति की धम्मिक मान्यता, धार्मिक मान्यता समय के अनुसार, आवश्यकता के अनुसार, राजनीति के अनुसार, राजा की इच्छानुसार, व्यापारिक नीति के अनुसार, विदेश में रोजगार के अनुसार, अपने आप को सुद्द और असुद्द (शुद्ध और अशुद्ध) करने के अनुसार, मांग कर खाना या मेहनत कर खाना की जरूरत के अनुसार, शादी के अनुसार, प्यार मौहब्बत के अनुसार, संगीति के अनुसार, जीवन यापन के अनुसार, आभार के अनुसार, सुविधानुसार जीवन रक्षा के अनुसार बदली रहती है। 

जो व्यक्ति पहले बुद्धिस्ट था, वह आज अपनी मर्जी के मुताबिक कुछ भी हो सकता है। धार्मिक या धम्मिक पहचान व्यक्ति की चलती फिरती पहचान है। यह पहचान बदलती रहती है। भारतीय समविधान भी आपको अपनी मान्यता दिन में दस बार बदलने की इजाजत देता है। आगे आने वाले दिनों में हजारों गुरू आयेंगे, हजारांे नई मान्यता बनंेगी और हजारों मान्यताऐं लुप्त हो जायेंगी।

फिर हमारी स्थाई पहचान क्या है?

कौन है हम लोग?

हमारी सभ्यता का नाम क्या है?

हमारी संखति/संस्कृति का नाम क्या है?

जवाब मिलता है मैगस्थनीज की इण्डिका नामक किताब से, जहां आपको समण ही समण मिलते हैं, समण महान सभ्यता के समण दार्शनिक, समण किसान, समण पशुपालक, समण शिकारी, समण व्यापारी, समण शिल्पकार, समण योद्धा सैनिक, समण निरीक्षक, समण पार्षद, समण मन्त्री, समण गुरू आदि।

बुद्ध के तिपिटक को पढ़ो, जहां कदम कदम पर समणा बमणा लिखा है। महावीर के आगम को पढ़ो, जहां समण (श्रमण) परम्परा भरी पड़ी है।

डॉ. अम्बेडकर के उस विचार को समझो, जब वह बताते हैं कि भारत में दो प्रकार के लोग पाये जाते हैं। एक प्रकार के जो ‘सम’ संस्कृति के लोग हैं जिन्हें ‘समण’ कहते हैं और दूसरे प्रकार के ‘वम’ सम्प्रदाय के लोग जिन्हें ‘वमण’ कहते हैं। समण सभ्यता है, वमण सम्प्रदाय, सेक्टर, वर्ग, वग्ग, वर्ण, कालोनी है।

यदि भारत के कुछ समण लोग, व्यापार करने इंग्लैण्ड जाते हैं। फिर वहां जाकर अंग्रेजी सीखते हैं, कोट-पेन्ट-टाई लगाते हैं। छुरी-कांटे से आमलेट खाते हैं। वहां की गोरी लडकियों से बच्चे पैदा करते हैं। तब क्या वे समण सभ्यता के लोग, वहां की इंग्लिश सभ्यता के लोग कहलायेंगे?

क्या वे समण लोग अब इंग्लिश संखति (म्दहसपेी बनसजनतम) के लोग कहलाये जायेंगे?  अब यदि वे समण लोग इग्लैण्ड पर राज करने लगे, तब क्या वहां के सभी लोग समण संखति (ैंउंद ब्नसजनतम) के लोग हो जायेंगे?

इग्लैण्ड का राज किसी के पास भी रहे, चाहे समणों के पास या अंग्रेजों के पास पर किसी भी हालात में इग्लैण्ड की संस्कृति (संखति) कभी भी समण संस्कृति (संखति) नहीं बन सकती है और ना ही कभी इग्लैण्ड में की दो प्रकार की संस्कृति, सभ्यता हो सकती है।

समण इग्लैण्ड में कितने भी ताकतवर हो जाये पर वे हमेशा वहां एक ग्रुप, एक घटक, एक समण संघटक, एक समण सम्प्रदाय, सेक्टर, वर्ग, वग्ग, वर्ण, कालोनी ही रहेगा। 

ठीक इसी प्रकार भारत के अन्दर भी अलग अलग समय पर अलग अलग देसों से भारत की सीमा में अलग अलग जगह से लोगों ने भारत में अतिक्रमण किया। इन सभी प्रकार के अतिक्रमण करने वाले लोगों को भारत के समणों ने वमण कहा। ये भी यहां व्यापार करने लगे, यहां की संखति में घुलने मिलने लगे। यहां तक की शासक भी बनने लगे। तब क्या ये लोग भारत की सभ्यता के लोग कहलाये जायेंगे? इसलिए इनको वमण सम्प्रदाय ही कहा जाता है। जैसे इग्लैण्ड के अन्दर समणों को समण सम्प्रदाय कहा जाता है।

4. खेतिय (क्षेत्रीय) पहचान: भारत में जो व्यक्ति जिस खेत (क्षेत्र) में पैदा होता है वो उसकी जन्म स्थल पहचान है। जहां जीवन भर अपना कार्य करता है वह उसका कार्य खेत (कार्यक्षेत्र) होता है। जहां कोई व्यक्ति अपना जीवन समाप्त करता है वह उसका परिनिव्वत खेत (अन्तिम क्षेत्र) होता है।

5. भासागत पहचान: जो व्यक्ति जो भासा बोलता है वह उसकी भासा गत पहचान कहलाती है। जैसे मलयाली, तमिल, गुजराती, उड़िया, पंजाबी, मराठी, तेलगू, पाली, ऊर्दू, अरबी, मारवाड़ी, संखारित पाली (हिन्दी), अंग्रेजी, जर्मनी, फ्रेंच आदि।

6. नाम रूप पहचान: पुराने समय में नाम का अर्थ होता था व्यक्ति के व्यवहार के गुण व अवगुण और रूप का अर्थ होता था व्यक्ति की काया के गुण व अवगुण। जैसे गुण अवगुण होते थे वैसी ही पहचान के लिए नाम रखा जाता था। जैसे काले बच्चे को काला, कालु, कृष्ण, किशन, किशना, कन्हैया, कण्ह, कण्हैया, सामा, सामावती, सामरी, सामरा, सावरा, सावल, सामल, सामलिया,  आदि।

7. लिंगात्मक पहचान: सभी जीवों में तीन तरह की लिंगात्मक पहचान होती है। नर, नारी, अर्द्ध नर या अर्द्ध नारी।

8. जन्म जात पहचान, जन्म से पहचान, प्राकृतिक पहचान: भारत में आज भी दो तरह की पहचान है, जो व्यक्ति को जन्म से अपने आप मिलती हैं। या तो व्यक्ति समण होगा या व्यक्ति वमण होगा। जैसा की ऊपर बताया जा चुका है।

Monday, July 1, 2024

मेरी आवाज़ ही पहचान है?



क्यों?
मेरी पहचान ही समण है
मेरी आवाज़ ही समण है


जानिए खुद को मैं समण हूँ
कौन क्या कब कहां क्यों और कैसे?

समणवादी या वमणवादी कौन है?
समणवाद क्या है?
वमणवाद क्या है?
क्या किसकी पहचान है?
क्या किसकी संस्कृति या शाखा संखति, सगा गोती, सगाजन रक्त संबंध पथु पंथ हैं।

हमें नहीं चाहिए
तुम्हारी पहचान तुम्हारी पहचान तुम्हें असफल किया है

कभी किसी के माबाप ने सन्नी नाम क्यों रख दिया शनिवार को पैदा हुआ था ना जन्म तिथि पता ना मरण तिथि पता उसे तो दिन शुभ शनिवार है

लोग जातिदिवस बताये इस दिन पैदा हुए, नाम ये रख दिए, ऐसा समझे कि नाम उसका साफ्टवेयर है जातरुप यानी हार्डवेयर है।

#नामरुप:
जात (#Birth)यानी जन्म रूप (#Form) और
#नाम (#Name)यानी #नामदान (#Namify) से जो पहचान मिलती है वह #शाखा #संखति हैं।

अर्थ-#जन्म भेद से #जातिवाद/#जातिवादी, #रुप (#Form) भेद से वण्ण #रंग/#वर्णवाद/#वर्णवादी और #मन (#Mind) भेद से #मनवाद/#मनुवादी इत्यादि सभी #भेद- #Negative #Discrimination हैं।

भेद तो ये है फिर
तो कभी शूद्र अतिशूद्र अश्पृश्य अछूत अनटचेबल्स दलित रौंदा हुआ, कुचला हुआ टुकड़ों में बिखरा हुआ तो कभी बहुजन तो कभी मूल निवासी आदि निवासी तो अर्जक कमेरा कबिलाई किसान कामगार मजदूर श्रमिक श्रमण कहा गया ये वे कौन लोग हैं जो पहचान थोपते हैं। इकट्ठा नहीं रहने देते संगठन बना बना कर पीठ में पहचान चिपकाते है। इसलिए ये बाहर से शरीर में प्रवेश करती तरंगें है पहचान है। पर शरीर से बाहर की ओर निकलती तरंगें कौन सी है वही असली पहचान है जो आपको चौघड़ी तरंगित करती है। जो ध्यान से आती है।

तो पायेंगे वे भावना शांत है शून्य है न्यूट्रल है सम है समयक है सभी जीव जन्तु पशु पंछी के लिए मैत्री है। जो जीव जगत के दुःखो से पारगू है जो शरीर की वेदनाओं को पूरी तरह जान लिया है अब उसकी भावनाएं पूरी तरह समयक ज्ञान समयक संस्कृति में सम विधान में रमण करती है तरंगित संवेदनाएं समता स्वतंत्रता बन्धुत्व भाव की मैत्री करुणा विचरण करती है न्याय करती हैं अच्छे मार्ग सीधे मार्ग विधि मार्ग उचित मार्ग पर चलती है रम में लीन रहती है वही समण है। इसके विपरित उल्टे चलने वाला वमण है बमण है बमणवाद है बमणवादी है। समण अपने भीतर की तरंगों की बात सुनता है वहीं बमण बाहर की तरंगों से संचालित होता है। बमण बिष है मृत्यु है ये प्रेम के प्रेम विवाह को बिष ही बताएंगे समाज में सतायेंगे जबकि समण जीवन है शरीर की प्राणवायु शक्ति है। जिस तरह सांस मिलने से शरीर खिलखिला उठता है वही सांस छोड़ते ही मुर्छित होता है मुरझाता है फड़फड़ाता रहता है झटपटाता है भ्रम के जाल में भटकता रहता है। इस नफ़रत की आग से शरीर को नष्ट होने से बचाये संघ में रहे सुखी रहे सुरक्षित रहे जीवन से जीवन में प्रेम बनाये रखें। यही जीवन के रहते साश्वत है मृत्यु के आपके लिए कुछ भी शाश्वत नहीं है शुभ नहीं है जो कुछ है जीवन में शाश्वत क्षण है। संघ यानी जीवन में साथ साथ गति प्रगति करना संगति है संखति है जो जन्म से मृत्यु तक लगातार जीवन में चलती है।

#राष्ट्रशासकसमणसंघ (#RSS)

#संघशासनहेतुसंघसंसद (#SSS)

राष्ट्रशासक का अर्थ - धरती की सीमाएं देश की सीमाएं शासक सीमाएं

राष्ट्रशासन का अर्थ - राष्ट्र की शिक्षा, राष्ट्र की सिखा पद

संघ का अर्थ - पशु पंछी जल जंगल पहाड़ पर्वत की भांति डटे रहना इकट्ठा रहना संघ में रहना संघ में सुखी सुरक्षित रहना

संघशासन का अर्थ - संघ की शिक्षा, संघ की सिखा पद, संघ चरया संघादिसेस

संसद - सन्निकट सन्निपात करना, चरिया चरिका करना, बैठक पंचायत करना

'समण' का अर्थ #हम भारत के लोग हम #समता में #रमण करने वाले लोग ...समता की भावनाओं में #विचरण करने वाले वे लोग वे #मनुष्य जो इस #पृथ्वी पर सदा से रहा है और सदा तक रहेगा। #पुरातन समय से भारत में दो संस्कृतियों के लोग #समण और #बमण है। #समणों के #भारत में मैं भी एक समण हूँ। #मैंसमणहूँ
#संघ
#मैंसंघहूँ
#मैंसंघीहूँ
#मैंसमणहूँ
#मैंसमणसंघीहूँ
#शाखा #संगीति
#कांशीरामबहुजनविचारविज्ञानकेन्द्र
#सामाजिकपरिवर्तनएवंआर्थिकमुक्ति
#अम्बेडकरप्रतिभाविकाससंस्थान
#विश्वविद्यालयसत्यशोधकसमाज
#iamsangh #iamsaman
#UniversalTruthSeekersSociety
#VishwavidyalaySatyashodhakSamaj 
#ScientificideasofKanshiramBahujan
#Ambedkarinstituteofintellectualdevelopment
#SocialTransformationandeconomicemancipation

Monday, June 17, 2024

How is Saman Sangh a perfect master who better teaches the Justice Equality Liberty Fraternity of Constitution?

How is Saman Sangh a perfect master who better teaches the Justice Equality Liberty Fraternity of Constitution?


Saman Sangh asserts its lineage tracing back to pre-Buddhist times, deriving its name from the Pali language, signifying people who advocate equality. It operates on the foundational principle of equality, devoid of hierarchical leadership.


The Sangh maintains that the Samans, representing SC/ST/OBC/Converted minorities, were divided into 6473 groups by the Vamans, opposing ideologies that reject equality. Samans assert that Vamans identify themselves as Baaman and Brahmans. The Sangha operates through 13 committees, eschewing leadership in favor of spokespeople.


According to Samans, inhabitants of undivided India were known as Samans beyond its borders, while those within were referred to as Vamans, representing the antithesis of Samans' principles. The Sangha adopts a decentralized structure with no designated leader, emphasizing the role of spokespeople.


The Ten Commandments of Saman Sangh


Exclusivity of Samans: Saman Sangh upholds the belief that SC/ST/OBC communities are the indigenous inhabitants of the country, known as Samans, who advocate equality. Only individuals belonging to these communities can become members. Those born as Samans are automatically included, while those marrying outside the community can join but remain inactive.


No Donation Policy: Unlike many organizations representing marginalized sections, Saman Sangh refrains from collecting donations. Instead, it conducts daily Zoom meetings at 8 PM, free of charge. Physical gatherings may involve charges for meals, exclusively for attendees.


Rejection of Caste System: Rejecting the caste system, Saman Sangh opposes discrimination based on caste, color, or creed, emphasizing unity among Samans.


Sole Allegiance to Saman Sangh : Members are prohibited from joining other organizations as Saman Sangh stands as the sole representative of native and marginalized communities.

Abolition of Prestige and


Hierarchies: Saman Sangh denounces practices like post prestige, stage prominence, and garland ceremonies, considering them factors contributing to organizational disintegration. It advocates equality among all members.


Non-Registration Principle: Rejecting the need for registration, Saman Sangh asserts that equality among members precludes the necessity for hierarchical structures inherent in registered organizations.


Adherence to Sangh's Rules: Strict adherence to Sangh's rules is mandatory, and deviation can result in expulsion from the Sangh.


Non-Involvement in Politics: While members are free to join political parties, Saman Sangh itself refrains from political involvement, recognizing the transient and dynamic nature of political power.


No Forgiveness for Betrayal: Those engaging in activities detrimental to the Sangh's integrity or causing harm to its members face expulsion without the possibility of reinstatement. Historical examples illustrate the Sangh's commitment to this principle.


Immutable Foundation: These nine rules form the immutable foundation of Saman Sangh, representing the core principles upon which the Sangh is built, ensuring its integrity and continuity.

Saturday, June 15, 2024

हमारा संघ समण संघ

समण संघ अपना है भारत या भारत से बहार रहने वाले सभी समण भाई-बहनो का अपना समण संघ है समण परिवार है संघ की राह पर चलने वाला समण भाई समण बहन कभी दूखी नहीं होता है संघ की राह पर सभी समण भाई बहन को एक-दूजे का हाथ पकड़‌कर चलना होगा तभी हम मंजिल को सुख सागर को प्राप्त कर सकते है संघ की राह पर चलने के लिए अपनी मानसिक शांति का होना बहुत जरूरी है हम समणों की मानसिक परेशानी का कारण है, हमारी पुरानी रूडीवादी परंपराये नशा,व्यक्भिचार, लोग दिखावा करना, दहेज लेना-देना, मृत्यू भोज करना, फिजुलखर्जी करना आदि-आदि इन सबको त्यागकर समण संघ की राह पर सभी को चलना होगा समण संघ के नियम अपनाकर जीवन जीना होगा जीवन के उत्थान में जो भी परंपराये बाधक है उन सबको छोड़ना होगा और समण कल्चर को अपनाना होगा समण संघ शरण आना होगा संघ शरण आओ जीवन का का कल्याण करो आज तक जिन्होने भी संघ की शरण ली है संघ के नियम अनुसार जीवन आचरण किया है आज वह सब सुखी जीवन जी रहे हैं वर्तमान समय में हमें अपने दुख से मुक्ति चाहिए तो संघ के नियमों को अपनाकर संघ की शरण में आना होगा जिसमें सभी का कल्याण होगा आज वर्तमान समय में संगठन की नहीं संघ की आवश्यकता है सभी महापुरुषों ने शिक्षित होकर संघ में रहने को कहा है विश्व गुरु महासमण तथागत बुद्ध ने भी कहा है संघम शरणम गच्छामि संघ की शरण में आओ संघ से ही सबका कल्याण होगा -समण अनूप टीकली

What is Saman Sangh?

Saman Sangh is the oldest unit selfless people's of the world. It has no founder. It has been developed even before Enlighten Buddha's time. Buddha make it fine-tune. There is no any particular leader of the Sangha. It takes collective decision. All it's member's have no Raga (Anger) no dosa (jealousy), Moha (desire),no Tanha (the Craving). It believe in Ten Golden rules. Which firmly believes that there is no need of Post,Public fund,Dignity,Ego. Human being can unite forever if he/she follows these rules. Saman Sanghs main mote force is the idealogy produced by great Saman Sanghi as The Enlighten Buddha,The Great Emperor Asoka, Great Saints such as Kabir,Gurunanak,Ravidas, King Shivaji,Jyotiba, Savitribai Phule, king Shahu, Shahu Maharaj ,Ramaswami Naukar,Great Dr Babasaheb Ambedkar,Kanshiramji.

Main objective of Saman Sangha is to unite all samans SC ST OBC and Converted minorities together to bring liberty,equality, fraternity and Justice in the masses so that India can be a nation.

How did BR Ambedkar's time in New York and at Columbia University shape his life and legacy?

Dr Ambedkars stay in Columbia was the foundation of his future idealistic thinking. Once he asked to his teacher Prof Edwin Selingman how to study and prepare for various projects. Selingman replied You read voraciously whatever you like,you will find your own way. Dr Ambedkar studied for 18 hrs daily. Within six months he was only one student who was allowed to teachers room. Dr Ambedkar had huge discussions and arguments with his eminent teachers such as John Dewey, A. Goldenwiser ,James Shotwell,Willam Harvey Robinson and many more. His thoughtfulness in Economics (Selingman), Political science & Philosophy (Dewey), other's. Dr Ambedkar was most loving Student of all his teachers. His ideas and arguments was surprisingly impressive to his teachers. His ideas of Justice, Liberty, Equality, Fraternity,and Humanity shape up in Columbia and later on London. Buddha's wisdom make Dr Babasaheb Ambedkar more powerful than his teachers. His importance has been widely recognised in western World as compared to his motherland. Those will be the golden day's of India when Indian's will accept Dr Ambedkar seriously. He is most genius man of modern World.

What is the significance of Babasaheb Ambedkar's fight for a uniform civil code in India?

Yes Dr Babasaheb Ambedkar was in favour of UCC, but not having intention like present ruling Govt.his intention was to make society based on equality,and to liberate woman from all religious bondages.

Today's Govt is having polluted intention. They do not utter any single word regarding equality of downtrodden class and woman of their own religion which has been denied religious,social, spiritual and economic rights of 50% woman population of our country. Today's Government having intention to bring UCC it will disturbe the basic fabric of our great country which has just started to become India a nation.
Hatread does not cease by hatred,but only by love this is eternal rule. ….Lord Buddha

What is Dr. Babasaheb Ambedkar’s book?

There are approxemetely more than 56 big and small books,thesis, essays,historic articles written by great Dr Babasaheb Ambedkar. Many more unpublished material in his lifetime, that is published by GoM,and GOI as Writting and speeches of Dr Babasaheb Ambedkar. Some of Big influencial book's viz.


The Buddha and his Dhamma,Annihilation of Caste, Caste in India, The Untouchables, Waho were Shudras?, What Gandhi and Congress have done to the Untouchables?, Gandhi Ranade and Jinnha, Ancient Indian Trade and Commerce, Evolution of Provincial finance in British India (PhD), The Problem of Rupee (D.SC ), Rise and downfall of Hindu woman, Buddha and future of his religion, Thoughts on Pakistan, Communal deadlock and way to solve it, States and Minorities (Mini Constitution),Mr. Russul and Reconstruction of Society, many memorundums to various commissions such as Memondurums to Southbourogh commission, Royal commission, Waber commission, Simon commission, Crips mission. So many drafts to various communities of Constitution. And Draft and final copy of Greatest Construction of the world i.e. Indian Constitution. Thousands of Articles in his Newspapers Mooknayak,Bahiskrut Bharat,Samta,Janta,Prabuddha Bharat.

How was Dr. B. R. Ambedkar chosen as the leader of the constituent assembly drafting the constitution of India? What is the story?

His credibility. He was great economist, statesman, philosopher, anthropligist, Jurist, Historians, and many more intellectual feathers in his cap. His great work in various 19 subcommittees influenced congress leadership.


His mini Constitution draft “States and Minorities" shows path towards making of great constitution of India.

He was good friend to Winston Churchil, and had great reputation with his colleagues in London University. His ideas about secularism,and his basic thoughtline was having great principles Equality, Fraternity and social Justice.

He advocates for New India which was based on scientific developement of strong India.

Hence was fully deserves to be architect of Indian Constitution.

सांख्ययोग विश्लेषण: लोकसभा चुनाव 2024 18वीं लोकसभा के 543 सदस्य

प्रतिक्रिया में समण सत्यशोधक / कांशीराम बहुजन विचार विज्ञान केंद्र 

(Kanshiram Bahujan Vichar Vigyan Kendra)


यूपी में बहनजी ने जो घाव अतीत में भाजपा को दिए हैं, उसको भाजपा कभी भुलना नहीं चाहेंगी। भाजपा ने मजबूरी में बसपा को समर्थन देकर 1995 में बहनजी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था लेकिन भाजपा ने 4.5 महीने में ही बसपा से समर्थन लेकर बहन जी की सरकार गिरा दी थी क्योंकि भाजपा समझ चुकी थी कि बसपा अपनी विचारधारा का तो फैलाव कर रही है लेकिन भाजपा की हिन्दुत्वी विचारधारा कमजोर पड़ रही है। 1997 के विधान सभा चुनाव मे फिर किसी की मेजॉरिटी नही आई, बसपा मजबूत हुई व भाजपा कमजोर हुई और 6 महीने तक सरकार न बनने की स्थिति मे विधानसभा भंग होने के कगार पर खड़ी यूपी विधानसभा मे भाजपा ने फिर बसपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला लिया।


दोनों ने 6-6 महीने सरकार चलाने के फार्मुले पर सहमति बनाई, भाजपा चाहती थी कि वो बड़ी पार्टी होने के नाते पहले सरकार बनाएंगी लेकिन मान्यवर और बहनजी ने उनकी ये शर्त नहीं मानी। बहनजी को दूसरी बार फिर भाजपा ने समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनाया, बहनजी ने फिर अपनी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली नीति को ही आगे बढ़ाया, 6 महीने होते ही सरकार भाजपा की बनाई गई लेकिन कुछ ही दिनो मे भाजपा ने बसपा को तोड़ दिया और बाकी समय के लिए खुद ही मुख्यमंत्री पद पर कब्जा बरकरार रखा। बसपा और भाजपा के रिश्तों में फिर कड़वाहट भर गई। मान्यवर और बहनजी को 1999 में भाजपा से बदला लेने का फिर मौका मिला और अब की बार बसपा ने भाजपा को केन्द्र से ही अपनी 6 सांसदो की ताकत के बलबुते उखाड़ फेंका । अटल बिहारी वाजपेई की सरकार सिर्फ 1 वोट से गिरी थी, बसपा अंत तक इंतजार करती रही और जब संसद भवन में वोटिंग के दौरान उनको भरोसा हुआ कि सरकार गिराई जा सकती हैं, उन्होंने अपने सांसद मोहम्मद आरिफ खान को खुशी से चिल्लातें हुए कहाँ कि आरिफ लाल बटन दबाओ । उधर बसपा की 6 वोटे भाजपा की सरकार गिराने के पक्ष में गिरी और उधर वाजपेई सरकार 1 वोट से गिर गई। बहनजी मंत्री पद की भुखी या मौकापरस्त होती तो कई मंत्रीपद और अन्य फायदे ले सकती थी लेकिन उनकी राजनीति अन्य दलित नेताओं से अलग ही रही हैं, वो कांग्रेस या भाजपा की नहीं बल्कि अपनी सत्ता की लड़ाई लड़ती आई है।

2002 के आम चुनाव में फिर त्रिशंकु विधानसभा बनी, इस बार बसपा और ज्यादा मजबूत हुई और भाजपा और भी कमजोर हुई। भाजपा ने फिर बसपा को समर्थन देकर सरकार चलाने का मौका दिया। सरकार 2003 तक ठीक ठाक चली लेकिन भाजपा चाहती थी कि बसपा और भाजपा पूरे देश में मिलकर चुनाव लड़े और इसके बदले वो बहनजी को 2007 तक मुख्यमंत्री बने रहने का ऑफर भी दिया और साथ मे मान्यवर कांशीराम को भी राष्ट्रपति बनाने का ऑफर दिया। मान्यवर और बहन जी ने भाजपा से मिलकर चुनाव लड़ने को मना कर दिया और साथ में ही मुख्यमंत्री पद से भी इस्तीफा देने पर सहमति जताई। अगर बसपा और भाजपा का 2004 लोकसभा मे गठबंधन हो जाता तो शर्तिया 2004 में भी भाजपा की ही सरकार बनना तय था और हो सकता है, 2004 से लेकर आज तक भाजपा का ही शासन होता।

2007 चुनावों में भाजपा और भी कमजोर हुई और बसपा मेजॉरिटी की सरकार बनाने में सफल रही। 2012 के चुनावों तक मीडिया ने भी बसपा को खुब बदनाम किया और हर तरह से गुंडागर्दी के लिए मशहूर सपा सरकार को जीताने की कोशिशे की गई। फिर भी बसपा के 38 लाख वोट बढ़ी लेकिन सपा कांग्रेस भाजपा की अंदरूनी मिलीभगती के चलते सपा के 90 लाख वोट बढ़े और कांग्रेस भाजपा के वोटो के सपा में ट्रांसफर के चलते सपा ने चुनाव जीता। 2013 में अखिलेश यादव के कुशासन मे मुजफ्फरपुर शामली हिन्दू मुस्लिम दंगों के चलते भाजपा की तरफ हिन्दू वोटो का ध्रुवीकरण हुआ और हिन्दू मुस्लिम का सपा भाजपा मे बंटना शुरू हो गया। अखिलेश यादव की दंगो पर कंट्रोल न करने की नाकामी ने 2014 में भाजपा को 14% वोटो से सीधा 41% पर पहुंचवा कर केन्द्र में मोदी सरकार बनवाने का काम किया। भाजपा ने 2014 में 71 सीटें जीती और 2 उसके सहयोगियों ने जीती थी जिनकी बदौलत भाजपा की केन्द्र सरकार बनी थी।

2019 मे सपा बसपा रालोद गठबंधन में सिर्फ दलित मुस्लिम वोट ही थे, बाकी तकरीबन सब जातियाँ भाजपा की तरफ मुड़ चुकी थी। 2022 और 2024 चुनावों में बसपा से मुसलमानो और दलितों का काफी वोट मीडिया सोशल मीडिया की मेहरबानी और बसपा के राय बहादुरों की फैलाई नैगेटिविटी के कारण भाजपा को हराने के नाम पर सपा गंठबंधन को गया।

Sangh: Kanshiram Bahujan Vichar Vigyan Kendra

संघ

:::संघ:::
ऐसा संघ जो अच्छे #स्वतंत मार्ग पर चले।
ऐसा संघ जो सीधे #बन्धुत्त मार्ग पर चले।
ऐसा संघ जो विधि #न्याय मार्ग पर चले।
ऐसा संघ जो उचित #समता मार्ग पर चले।
ऐसा समण संघ। हमर अपना #समण संघ।
ऐसा समण संघ जो
बमणों का नहीं, समणों का संघ है।
विषमता का नहीं, समता का संघ है।
#संघ

बुद्ध से पहले एक संघ चलता था 'समण संघ'। जिसे हमारे ही पुरखों ने चलाया था। सभी प्रकार के निर्णय और फैसले संघ के द्वारा ही किये जाते थे। संघ का निर्णय ही सर्वोपरि माना जाता था। संघ के द्वारा ही चक्रवर्ती महान सम्राट अशोक ने स्वर्णिम शासन चलाया। सम्राट अशोक ने ही अपने शासन के दौरान “महाभारत” बनाया था। भारत के पुराने समण लोगों का संघ , जिस संघ ने बुद्ध जब बुद्ध नहीं थे , सिद्धत्थ गोतम थे उस समय उनको संघ का आदेस न मानने पर संघ निकाला, देस निकाला कि सजा दी थी (समण संघ / वमण संघ)

#संघ
जुड़ेंगे, जीतेंगे
जिद्द है, जुड़ने की
जब जुड़ेंगे, तब जीतेंगे
जितना जुड़ेंगे, उतना जीतेंगे
जहां जहां जुड़ेंगे वहां वहां जीतेंगे
जैसे जैसे जुड़ेंगे वैसे वैसे जीतेंगे
जो जुड़ेंगे वो ही जीतेंगे
अभी जुड़ेंगे तो अभी जीतेंगे
100 साल बाद जुड़ेगे तो 100 साल बाद जीतेंगे
जुड़ोऔर जीतो!


" दस गोल्डन नियम" (Ten Golden Rule)

1. समण संघ में केवल समण ही आ सकते हैं
2. समण संघ में कभी चन्दा नहीं लिया जायेगा
3. हम केवल समण हैं, संघ में कभी जाति का अभ्यास नहीं होगा. यानि किसी भी जाति के नाम का संबोधन नहीं किया जायेगा
4. समण संघ में केवल संघवाद रहेगा, व्यक्तिवाद को कोई स्थान नहीं
5. संघ में कभी भी पद-प्रतिष्ठा-मंच-माला को कोई स्थान नहीं होगा.
6. समण संघ का पंजीकरण कभी नहीं होगा
7. संघादिसेस यानि संघ का आदेश सभी के लिए सबसे ऊपर रहेगा
8. संघ राजनीति में कभी नहीं जायेगा
9. संघ घातक की वापसी संघ में कभी नहीं होगी
10. उपरोक्त 1 से 9 तक के नियम संघ का आधार हैं, ये ना कभी बदले जायेंगे और ना ही कभी ख़त्म किये जायेंगे और ना ही कभी अमान्य किये जायेंगे।


"बिखरा हुआ समाज या बिखरे हुए लोग कभी शासक नहीं बन सकते! --मा.साहेब कांशीराम जी

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