सप्ताहिक कार्यवृत्त संगोष्ठी 19 मई 2024 में प्रस्तुत है
" #जाति #विनाश का #वैज्ञानिक #समन #प्रयोग" चर्चा में भाग ले रहे- सत्यशोधक पीके रामचंद्र, समण संघी सी पी सील्यानी, गिरीश भारती और शोधार्थी मुकेश राठोर#I am a Samana #Why #why? 'Saman' means a person who lives with the feelings of equality. He has always lived on this earth and will always live on it. #sm #smn #Sam #samtal #samanta #barabar #santulan #madhyam #Bheech #saman #shraman #sarman #sermon #samma #samman #dhamma #dhammik #amma #amin #swabhiman #right #level #neutral #middle #between #Saman #Shramana #Sramana #Right #Respect #Swabhiman #Abhedha #Nirbhedha #Sankhyayog #Nyayavishesha #ParguMimansa #Vedantagu #metta #mamtta #mamta #quality #Equality #equal #degree #balance #just #justice #middlepath #fraternity #freedom #equilibrium #equalopportunity #egalitarianism #fairness #impartiality How am I a Samana? Why am I a Samana? My historical, national identity is Samana. Saman (समण) means - 1. One who enjoys equality, 2. Egalitarian, 3. One who possesses the quality of equality 4. One who follows the quality of equality in practical life. By joining the Saman Sangha, I learnt, understood and adopted equality and for the last 36 months, by staying in the Saman Sangha, I am increasing the observance of this quality of equality by making some positive changes in myself every day. I am eliminating any kind of inequality (discriminatory behaviour - which is man's own defect). I am eliminating the feeling of caste discrimination, position/prestige discrimination, regional discrimination, gender discrimination etc. from within myself and from my mind. Therefore, I am a Saman. Salutations to the Sangha. "क्या जब तक जाति है जाति ढोने के लिए बच्चे का जन्म नहीं देना चाहिए?" पालि में 'जाति' अर्थ 'जन्म' है: पालि भाषा में जात मतलब जन्म से है हम जात से समण है मतलब हम जन्म से ही समण है। 'समण' का अर्थ समता की भावनाओं में विचरण करने वाला मनुष्य। जो इस पृथ्वी पर सदा से रहा है और सदा तक रहेगा। यह दोनों अति से परे है, यही सनातन संघ हैं। वह न ऊँच हैं न नीच है वह तो सम है। समता में रमण करने वाला समण है। वह न तो अत्थि है न वह नत्थि है पर वह तो जनमजात वत्थि है वास्तविक है समण है क्योंकि यह प्रकृति संस्थापित पुरातन संघ है पुनपवत्तित समणो का अपना संघ है। संघ का तीसरा गोल्डेन सूत्र कहता है। जाति अभ्यास कभी नहीं। यही जाति उच्छेद का हेतु है जाति का विनाश है। इस पर समण संघ के स्पोक इंजीनियर सुधीर राज कहते हैं कि पहले आप बताओं की जाति से क्या समझते हो? क्या है जाति? कहीं लिखी हुई है? किसी पुस्तक में है? क्या किसी ने बनाई है? क्या है ढ़ांचा? बाबा साहेब ने बताया है? कब बनी? किसने बनाई? कितनी लम्बी? कितनी ऊंची? कितनी चौड़ी? कितनी भारी? किस किताब में? किस वेद में? कौन छोटी? कौन बड़ी? कौन नीची? कौन ऊंची? कौन पतली? कौन मोटी? आखिरी कब बनी? पहली कब बनी? किसका अकल? किसका ताला? किसकी चाबी? किसका चाभा? थोड़ी अकल लगाओ, अपना अकल खोलो। अपने अकल का ताला खोलो। बाबा साहेब कहते हैं जाति दिमाग की सूचना (नोटिस आफ माइंड) है। इसका कोई अस्तित्व नहीं है। जिसका कोई अस्तित्व नहीं है। उसका अभ्यास हम क्यों करें? जो हमारा है नहीं तो उसका अभ्यास हम क्यों करें। हमारी समण संस्कृति हमारे संघ में हमें जाति मिलती नहीं है। जिसका है जो सरकार आरक्षण देती है। उस सर्टीफिकेट में तो जाति लिखी जाती है। तो क्या जरूरी है लड्डू खाओ तो गले में लटकाओ। जाति अभ्यास क्यों करते हो? नाम में जाति क्यों लिखते हो? नाम के पहले अक्षर में माता का दूसरा मध्य अक्षर पिता का तीसरा अंतिम अक्षर अपने नाम को लिखों। जाति पर सत्य शोधक वरिष्ठ राष्ट्रचिंतक P. K. Ramchandra से हुई वार्ता के बिन्दु अम्बेडकर सफल लोकतंत्र के लिए "जाति का विनाश" चाहते थे। पर यह तभी संभव होगा जब हम इकट्ठा हो जाए। समतावादी समण (समान) पहचान को कोड भाषा बना लें। जाति अंत पर लगभग लाखों पुस्तक लेख प्रकाशित हुई पर क्या लाभ? पर समाधान अब तक नहीं, क्योंकि न तो विवाह न तो खानपान न तो अवसर सम्मान का हित। तो हमारा चिंतन समस्या समाधान केन्द्रित खोज होना चाहिए। तो सवाल है पहचान का यदि जाति खो देंगे तो आपकी पहचान क्या होगी? तो उनके लिए उत्तर है जो समता में भावना विश्वास रखते हैं करते हैं समता में रमण करते हैं अर्थात् समता में रहते हैं वे समतावादी ही समण है। फिर समणो की क्या पहचान तो समण कभी जाति को नाम लेकर नहीं पुकारता सिर्फ वमण (जो स्वयं विष में जीता है विषमता में जीता है खुद श्रेष्ठ न हो पर जाति को श्रेष्ठ कहता है खुद की जाति बताकर श्रेष्ठ साबित करता है) ही जाति का उच्चारण करता है जाति से बुलाता है। सत्य शोधक रामचंद्र का कहना है हमें अपना नाम (माता+ पिता+ नाम) उदाहरण माता का नाम 'समणी' है, पिता का नाम 'समण' है फिर नवजात शिशु का नाम 'बोधि' है तो एस.एस. बोधि लिखा जायेगा, इसे DNA बेस्ड वैज्ञानिक नाम कहते हैं। यह दक्षिण भारत में लिखने का चलन है। आखिरी में गांव/शहर का नाम भी जोड़ते हैं। समण संघ का उत्तर है पाली भाषा में जन्म को जाति कहते हैं जाति पाली का शब्द है। इसलिए हम जाति के चक्कर में नहीं पड़ते न ही हमें इससे फर्क पड़ता है न ही हम खून खौलाते न ही ऊर्जा समय बर्बाद नष्ट करते हैं।


