Saturday, May 11, 2024

पुरातन संघ सनातन संघ : समण संघ

हमारा पुरातन संघ-प्रकृति संस्थापित समण संघ है। समण संघ का संस्थापक कोई व्यक्ति या जानवर नहीं है। इसकी स्थापना खुद-ब-खुद हुई है। प्रकृति इसकी संस्थापक है। सुरक्षा और विकास इसका मुख्य कारण है। पृथ्वी पर जो वस्तु या जीव, पेड़ पौधे आज अपनी स्थिति मंे विद्यमान हैं वे सभी अपने संघ के कारण से ही सुरक्षित और विकसित है। जो चट्टानें सघन हैं। वे विद्यमान हैं, बाकी रेत की भेंट चढ़ गईं। जो पानी इकट्ठा है वो समुद्र है, जो मिट्टी सघन है, वो खेत है। जो पौधे झुण्ड में हैं, वो आज विद्यमान हैं। जो मछली, समुद्री जीव आज तक झुण्ड में तैरते हैं, वो अभी बचे हुए हैं। जो जानवर जंगल मंे झुण्ड में हैं उनका अस्तित्व है। अभी जो चिंटियां, दीमक, मधुमक्खी झुण्ड मंे रहती हैं, वो बढ रही हैं। ऐसे ही जिन व्यक्तियों का समूह संघ में हैं, वो शिकारी हैं, वे बढ़ रहे हैं। और जो व्यक्ति संगठनों में, जातियांे में बंटे पडे हैं, या अकेले पड़े हैं, वे शिकार हैं। संघ मंे रहने का एक भी नुकसान नहीं है। और संघ से बाहर रहने के हजारों नुकसान हैं। जो लोग संघ मंे रहते हैं, उनके पास हर वो चीज होती है, जो प्रकृति ने दीं हैं या जो मनुस्स ने बनायी हैं। धन दौलत, शिक्षा, घर, मकान, खेत, खलियान, मोटरकार, फैक्ट्री, दुकान, देशविदेश की यात्रा, बढ़िया खाना, बढ़िया कपड़ा, दवाई, सुरक्षा, सम्पन्नता, जेवर, गहने, सोना, चांदी, रुपया, हीरे, बैंक मंे पैसा सभी कुछ। और जो संघ से बाहर रहते हैं, वे गरीब, बीमार, अनपढ़, भूखे, नंगे, बेकार, मजबूर मजदूर होते हैं।
दुनिया में एक भी उदाहरण नहीं है कि जो व्यक्ति संघ मंे रहता है, वो भिखारी या याचक हो। पुरातन समण संस्कृति में समण सम्पन्न थे, मालदार थे। तब एक भी समण याचक नहीं होता था। ऐसे अनेक किस्से हमेशा सुनते थे हकीकत देखते कि वमण एक गरीब याचक समण के दरवाजे पर आकर याचना करता था, भीख मांगता था, समण लोग भीख देते थे। पर आज, वमणों ने संघ बनाया और आज समण याचक है, वमण के दरवाजे पर भीख मांगते हैं। दया लाचारी की भीख मांगते है। संघ बनाते ही बाजी पलट गयी। यह संघ की असीम ताकत है, संघ कमजोर को बलवान बना देता है। जो संघी हैं, संघ में रहते हैं, वो संघ की ताकत को पहचानते हैं। कुछ लोग जो अपने को किताब पढ़ कर बुद्धिजीवी कहते हैं, वे समझते हैं कि पढाई सब कुछ है। कुछ लोग जो अच्छा पैसा रखते हैं वे समझते हैं कि धन दौलत से सब हासिल होता है। जो लोग राजनीति करते हैं, वे समझतेे हैं कि राजनीति ही सब कुछ है। कुछ लोग जो अति धार्मिक हैं, वे समझतेे हैं कि हर व्यवहारिक समस्या का निदान केवल धर्म कर्म से ही हो जायेगा। कुछ लडके जो दल, बल, सेना सेनिक, सिपाही, आर्मी चलाते हैं, वे समझतेे हैं कि शारीरिक ताकत ही सब कुछ है। कुछ लोग संविधान का रट्टा लगाते, वे समझते हैं कि संविधान हमें बचायेगा। कुछ लोग आरक्षण को बचाने में लगेे हैं। जो गैरधार्मिक, गैरराजनीतिक संगठन मंे लगातार चंदा वसूलते जा रहे हैं, वे समझते हैं कि हमारा सामाजिक संगठन ही समाज को बचायेगा। पर पिछले कुछ सालों मंे सब गलत सिद्ध हुए हैं। आज पढ़े-लिखों की संख्या जैसे-पी.एच.डी, डॉक्टर, प्रोफेसर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, व्यापारी, अफसर, राजनेता व नौकरशाह की भरमार है, पर सारे अधिकार तो चले गए जो बचे भी है चले जा रहे है, जबकि ये बढ़ने चाहिए थे।

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