‘‘आप कौन जात हो?’’
आप कि
स जाति से हो? कौन जात हो? आपकी जाति क्या है? आपका पूरा नाम क्या है? आप क्या काम करते हो? आप किस मौहल्ले के रहने वाले हो? क्या आप रिजर्व कैटेगरी से हो ? आप किस पार्टी के समर्थक हो? आप ज्योतिबा फुले को मानते हो क्या? आप डॉ. अम्बेडकर के समर्थक हो क्या? ये वो प्रश्न है जो भारत में रोज करोड़ांे बार समणों से पूछे जाते हैं? जब भी कोई व्यक्ति ये प्रश्न करता है, तब वह सामने वाले की पहचान जानना चाहता है। भारत में एक व्यक्ति की निम्नलिखित आठ प्रकार की पहचान होती है।
1. पारिवारिक, गोत्त, कुल सम्बन्धी पहचान: चाचा-चाची, बब्बी, बुई, बुआ, ताऊ-ताई, दादा-दादी, नाना-नानी, भाई-बहन, बेटा-बेटी, पिता-माता, पोता-पोती, नवासा-नवासी, मौसा-मौसी, फूफा-फूफी, भतीजा-भतीजी, भांजा-भांजी, भाभी आदि आदि। मोरया गोत्त, गोतम गोत्त, सिंह गोत्त आदि।
2. काम, कार्य, कम्म, जाति, जात, जातिगत पहचान का अर्थ क्या है?
अहीर एक जाति का नाम है। यह पुराने सद्द अर॰॰ा (अरई) से बना है। अर॰॰ा का अर्थ है जंगली, अरण्य। जो व्यक्ति जंगल में निवास करता था, उसे अर॰॰ावासिक कहते हैं। जो अर॰॰ा में विहरता है, उसे अर॰॰ाविहारी या अर॰॰ाविहारिक कहते हैं। इसी अर॰॰ा विहार से घटते घटते सद्द बना अर॰॰ाहारी या अरहारी या अरहीर और अन्त में अहीर। अब अहीर एक जाति है। अर॰॰ाा या औरैया अब एक जिला है। एक बड़े से जंगल को अर॰॰ाानी कहते हैं।
रजक अब एक जाति है, जो कपडों का मल धोती है। ये वे लोग हैं जो अरजक थे। रज का अर्थ है मल/मैल। अरज का अर्थ है मल रहित। अरजक का अर्थ है वे लोग जिनके मन के मल/मैल धो डाले गये हैं। वे उँचे और महान लोग थे। जिनके मन में कोई मैला नहीं होता है, वहीं, अरजक आज के रजक या धोबी हैं। अब धोबी एक जाति है। मन का मल धोना अब एक जाति है।
फूल-माली-फूलों को तोड़ना, माला बनाना, अब एक जाति है। माली, माला, फूले अब काम नहीं, एक जाति है।
सेन/सेनक बाज को कहते हैं। जो बाज की तरह हमला करता है उसे सेनी/सैनी कहते हैं। सेनी से सेना, सैनिक/सेनिक, सेनिय, सेनापति, सेनानी बना। सेनी अब एक जाति है।
ध॰॰ा - चावल, दाल, गेहूँ, बाजरा आदि फसल के दानों को बोलते हैं। ध॰॰ा से धान सद्द बना। धान उगाने वाले को, बेचने वाले को, रखने वाले को धानुक कहते है, धानुक अब जाति है।
सांप पकड़ने वाला सपेरा
लोहा पीटने वाले को लोहार
सोना पीटने वाले को सुनार
खेत जोतने वाले को खत्ती/खत्री
कपडा बुनने वाले को बुनकर
नाव चलाने वाले को नाविक
छापने वाले को छैपी/छिम्बा
आराम पालन वाले को आरामपाल (पाल) (आराम = बाग)
पसु पालने वाले को पाल/पसुपाल
लिखने वाले को लेखपाल
कट्ठ बनाने वाले को कट्ठकार
वान बनाने वाले को वानकर
भय अन्त करने वाले को भन्ते
भय का दन्त करने वाले को भदन्त
भय का चक्खु दस्सन कराने वाले को भिक्खू
राज्य चलाने वाले को राजा
सवाल को बुझाने वाले को बुज्झ (बुद्ध)
मतलब जो व्यक्ति जो भी काम करता था, वो जो भी उत्पन्न करता था, वो ही उस व्यक्ति की जाति/ जात/उत्पन्नता का नाम पड़ गया।
जैसे आज आधुनिक नाम है डॉक्टर, इन्जीनियर, कम्प्यूटर आपरेटर, लिफ्ट आपरेटर, अर्किटेक्ट, ड्राईवर, शैफ, मैनेजर, प्रिन्टर, कटर, स्वीपर, ड्राई क्लीनर, शॉप कीपर, पुलिस, आर्मी, जज, वकील, सरकारी कर्मचारी, प्राइवेट कर्मचारी, प्।ैए प्च्ैए प्थ्ैए प्म्ैए प्ज्ैए डठ।ए ब्। ये सभी काम हीं हैं। अब हम इनको अलग भाषा में बोलते हैं। पर ये आज के हिसाब से पुरानी जात और जातियां ही हैं। बस नाम बदल गये हैं पर काम की उत्पत्ति नहीं बदली है।
मतलब साफ है यदि आप कोई काम करते हैं तब वह काम आपकी पहचान है। लोग आपको आपके काम से जानते हैं। पुलिस वाला, चायवाला, पन्चरवाला, सब्जीवाला, दुकान वाला, खेतवाला, बसवाला, आदि। यही सारे काम आपकी जात/जाति हैं। आपकी पूर्व काम की पहचान है। जात/जाति का पुरानी भासा में अर्थ है ‘उत्पन्न’। आप अपने काम के द्वारा जो उत्पन्न करते हैं वही आपकी पहचान थी।
पुरानी भासा में बुद्ध ने बताया कि चार पकार के दुख होते हैं जो मनुस्स के साथ रहते हैं।
1. जाति दुख - मनुस्स का उत्पन्न होना दुख है।
2. जरा दुख - मनुस्स का बूढा होना दुख है।
3. व्याधि दुख - मनुस्स का बीमार होना दुख है।
4. मरणं दुख - मनुस्स का मृत्यु होना दुख है।
यहां यह बिल्कुल साफ है कि जाति का अर्थ उत्पन्न होना, पैदा होना, जन्म लेना है।
आज भी हम आम बोल चाल में कहते हैं कि यह नवजात है या नवजात बच्चा है या उसका नवजात बच्चा और जच्चा दोनों सलामत हैं। नवजात का अर्थ है नया उत्पन्न या नया पैदा हुआ बच्चा। जच्चा का अर्थ है नवजात को जनने वाली माँ।
आप किसी भी सन्दर्भ में देख-परख लीजिए, जात और जाति का अर्थ पैदा होना, उत्पन्न होना, पैदा करना, उत्पन्न करना, जन्म होना, बनाने से ही सम्बन्धित मिलेगा।
जो मनुस्स कुछ पैदा नहीं करता है, कुछ बनाता नहीं है, कुछ उत्पन्न नहीं करता है, कुछ काम नहीं करता है, उसका जात/जाति ना पहले होता था, ना ही आज होता है। जो याचना करता है, जो भीख मांगता है, जो बाहर से आया है उसका जात या जाति ना पहले था, ना ही आज है। वमण का उदाहरण देखें, वमणों में कोई जात/जाति नहीं होता है।
वमणों में जाति/जात नहीं होती है, क्योंकि वे कुछ काम ही नहीं करते हैं। वे कुछ उत्पन्न ही नहीं करते थे। ठीक इसी प्रकार पहले के समय समणों में भी जाति/जात नहीं होती थी। क्योंकि समण लोग अपना काम बदलते रहते थे। एक बाप के चार बेटे, एक बेटा खत्ती जो खेत पर काम करता है। एक बेटा अर॰॰ा-विहारी जो अर॰॰ा (जंगल) में काम करता है, उसे अहीर कहते है। एक चम्मकार जो चाम की पानी की मश्क बनाता है। एक बेटा पशुपालक जो पशुओं को पालता है। वह पाल हो गया। तब आप उनकी एक जाति/जात कैसे कह सकते हैं। एक पिता की चार सन्तान चारों अलग-अलग उत्पन्न कर रहे हैं। चार जात/जातियां।
इससे यह साफ होता है कि दुनिया में कार्य की पहचान है। अंग्रेजी में ळवसक ेउपजीए प्तवद ेउपजी कहते हैं। भारत में सुनार, लोहार कहते हैं।
यदि आपका काम बदल जाता है तो आपकी जाति/जात भी बदल जाती है। यदि आप बदलना चाहे तब।
3. धर्म/धम्म/मजहब/ रिलिजन/ मत की पहचान: दो तरह के लोग रहते हैं दुनिया में, धम्मिक या अधम्मिक। संस्कारित भासा में धार्मिक या अधर्मी। बस यही दो बातें हैं। यदि आप धम्मिक/धार्मिक/ मजहबी/रिलिजियस हैं तब आप किसी व्यक्ति के मत को या व्यक्ति के द्वारा खोजे गये प्राकृतिक मत को, किसी सन्त के मत को या किसी समुदाय के मत को या ळवक के मत को मानते हैं और यदि आप धम्मिक नहीं है, तब आप अधम्मिक/अधर्मी हैं। जिसे आज की भासा में नास्तिक कहते हैं।
यदि आप किसी धम्म/धर्म को नहीं मानते हैं तब आप को अधम्मिक/अधर्मी बोला जायेगा।
यदि आप किसी मान्यता को मानते हैं तब आपको उस मान्यता के नाम की पहचान मिलेगी।
जैसे- यदि आप मौहम्मद साहब की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान मुसलमान होगी, यदि आप बुद्ध की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान बुद्धिस्ट/बौद्ध/बोध होगी, यदि आप महावीर जैन की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान जैनी होगी, यदि आप गुरू रविदास की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान रविदासी होगी, यदि आप गुरू कबीर साहब की मान्यता पर चलते हैं तब आपकी पहचान कबीर पन्थी होगी। ऐसी 4000 से भी ज्यादा मान्यतायें हैं जिनको लोग मानते हैं, कभी इन मान्यताओं को छोड़ देते हैं, कभी इन मान्यताओं को बदल लेते हैं।
भारत के समविधान में यह व्यवस्था है कि आप सुबह को इसाई मत को मानें, दोपहर को सिख मत को मानें, शाम को बौद्ध मत को मानें, रात को जैन मत को मानें, आधी रात कोे मुसलिम मत को मानें, फिर सुबह कबीर मत को मानंे, दोपहर रविदासी मत को मानें, शाम को गुरू घासीदास मत को मानंे, रात को गुरू हरिचाँद ठाकुर मत को मानें। इसका अर्थ यह है कि मनुस्स की धम्मिक/धार्मिक पहचान निरन्तर बदलती रहती है।
कांशीराम जी के मत को मानने वाले लोग 15 मार्च 1934 से पहले नहीं थे। तब वो कांशीराम जी के मत को नहीं मानते थे। किसी अन्य मत को मानते होंगे या किसी भी मत को नहीं मानते हांेगे। क्योंकि पीर फकीर समण सन्त मान्यवर कांशीराम जी 15 मार्च 1934 में पैदा हुये थे। उससे पहले पीर फकीर समण सन्त मान्यवर कांशीराम जी का अत्थितत्त (अस्तित्व) भी नहीं था।
कोई जो आज विश्वरत्न डॉ. अम्बेडकर का मानने वाला है, वह 14 अप्रैल 1891 से पहले डॉक्टर अम्बेडकर के मत को नहीं मानता था। किसी अन्य मत को मानता था। क्योंकि 14 अप्रैल 1891 से पहले डॉ. अम्बेडकर का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।
कोई जो आज महामना राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले, माता सावित्री बाई फुले के मत को मानता है वह 11 अप्रैल 1827 से पहले उनके मत को नहीं मानता था। क्योंकि उनका जन्म ही 11 अप्रैल 1827 में हुआ था। 11 अप्रैल 1827 से पहले आपको कोई भी सत्य शोधक समाजी नहीं मिलेगा। जो आज सत्य शोधक समाजी मत का है वह 11 अप्रैल 1827 से पहले किसी और मत को मानता होगा। क्योंकि 11 अप्रैल 1827 से पहले महामना राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।
कोई जो आज सिख मत को मानता है वह लगभग 500 साल पहले तक सिख मत को नहीं मानता था। भारत में, दुनिया में 500 साल पहले तक कोई सिख मत का बन्दा नहीं था। जो आज सिख मत में है, वे 500 साल पहले किसी और मत को मानते होगें। क्योंकि आज से 500 साल पहले सिख मत का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।
कोई जो आज गुरू रविदास मत को मानता है, कबीर मत को मानता है या अन्य सन्त मतों को मानता है, ये सभी सन्त, गुरू 700 साल पहले तक नहीं थे। जो अब इन मतांे को मानता है वह पहले किसी और मत को मानता था। क्योंकि आज से 700 साल पहले गुरू रविदास का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।
कोई जो आज मुसलिम मत को मानता है, वह 1454 साल पहले किसी और मत को मानता था क्योंकि मौहम्मद साहब का जन्म आज 2024 के हिसाब से 1454 साल पहले हुआ था। जब मौहम्मद साहब की पैदायश ही 1454 साल पुरानी है तब उनके मत को मानने वाले उस तारीख से पहले हो ही नहीं सकते हैं। तो जो आज भारत में मुसलिम लोग हैं वह 1454 साल पहले किसी और मत को मानते होंगे। जो कोई आज इसाई मत को मानते हैं वह 2024 साल पहले किसी और मत को मानते होगंे। क्योंकि आज से 1454 साल पहले मौहम्मद साहब का अत्थितत्त (अस्तित्व) ही नहीं था।
ठीक इसी प्रकार जो लोग आज बुद्ध मत को या जैन मत को मानते हैं वे 2600 साल पहले किसी और मत को मानते होंगे। वे लोग 2600 साल पहले ना बुद्धिस्ट होंगे और नाही जैनी हांेगे।
इसका मतलब साफ है कि व्यक्ति की धम्मिक मान्यता, धार्मिक मान्यता समय के अनुसार, आवश्यकता के अनुसार, राजनीति के अनुसार, राजा की इच्छानुसार, व्यापारिक नीति के अनुसार, विदेश में रोजगार के अनुसार, अपने आप को सुद्द और असुद्द (शुद्ध और अशुद्ध) करने के अनुसार, मांग कर खाना या मेहनत कर खाना की जरूरत के अनुसार, शादी के अनुसार, प्यार मौहब्बत के अनुसार, संगीति के अनुसार, जीवन यापन के अनुसार, आभार के अनुसार, सुविधानुसार जीवन रक्षा के अनुसार बदली रहती है।
जो व्यक्ति पहले बुद्धिस्ट था, वह आज अपनी मर्जी के मुताबिक कुछ भी हो सकता है। धार्मिक या धम्मिक पहचान व्यक्ति की चलती फिरती पहचान है। यह पहचान बदलती रहती है। भारतीय समविधान भी आपको अपनी मान्यता दिन में दस बार बदलने की इजाजत देता है। आगे आने वाले दिनों में हजारों गुरू आयेंगे, हजारांे नई मान्यता बनंेगी और हजारों मान्यताऐं लुप्त हो जायेंगी।
फिर हमारी स्थाई पहचान क्या है?
कौन है हम लोग?
हमारी सभ्यता का नाम क्या है?
हमारी संखति/संस्कृति का नाम क्या है?
जवाब मिलता है मैगस्थनीज की इण्डिका नामक किताब से, जहां आपको समण ही समण मिलते हैं, समण महान सभ्यता के समण दार्शनिक, समण किसान, समण पशुपालक, समण शिकारी, समण व्यापारी, समण शिल्पकार, समण योद्धा सैनिक, समण निरीक्षक, समण पार्षद, समण मन्त्री, समण गुरू आदि।
बुद्ध के तिपिटक को पढ़ो, जहां कदम कदम पर समणा बमणा लिखा है। महावीर के आगम को पढ़ो, जहां समण (श्रमण) परम्परा भरी पड़ी है।
डॉ. अम्बेडकर के उस विचार को समझो, जब वह बताते हैं कि भारत में दो प्रकार के लोग पाये जाते हैं। एक प्रकार के जो ‘सम’ संस्कृति के लोग हैं जिन्हें ‘समण’ कहते हैं और दूसरे प्रकार के ‘वम’ सम्प्रदाय के लोग जिन्हें ‘वमण’ कहते हैं। समण सभ्यता है, वमण सम्प्रदाय, सेक्टर, वर्ग, वग्ग, वर्ण, कालोनी है।
यदि भारत के कुछ समण लोग, व्यापार करने इंग्लैण्ड जाते हैं। फिर वहां जाकर अंग्रेजी सीखते हैं, कोट-पेन्ट-टाई लगाते हैं। छुरी-कांटे से आमलेट खाते हैं। वहां की गोरी लडकियों से बच्चे पैदा करते हैं। तब क्या वे समण सभ्यता के लोग, वहां की इंग्लिश सभ्यता के लोग कहलायेंगे?
क्या वे समण लोग अब इंग्लिश संखति (म्दहसपेी बनसजनतम) के लोग कहलाये जायेंगे? अब यदि वे समण लोग इग्लैण्ड पर राज करने लगे, तब क्या वहां के सभी लोग समण संखति (ैंउंद ब्नसजनतम) के लोग हो जायेंगे?
इग्लैण्ड का राज किसी के पास भी रहे, चाहे समणों के पास या अंग्रेजों के पास पर किसी भी हालात में इग्लैण्ड की संस्कृति (संखति) कभी भी समण संस्कृति (संखति) नहीं बन सकती है और ना ही कभी इग्लैण्ड में की दो प्रकार की संस्कृति, सभ्यता हो सकती है।
समण इग्लैण्ड में कितने भी ताकतवर हो जाये पर वे हमेशा वहां एक ग्रुप, एक घटक, एक समण संघटक, एक समण सम्प्रदाय, सेक्टर, वर्ग, वग्ग, वर्ण, कालोनी ही रहेगा।
ठीक इसी प्रकार भारत के अन्दर भी अलग अलग समय पर अलग अलग देसों से भारत की सीमा में अलग अलग जगह से लोगों ने भारत में अतिक्रमण किया। इन सभी प्रकार के अतिक्रमण करने वाले लोगों को भारत के समणों ने वमण कहा। ये भी यहां व्यापार करने लगे, यहां की संखति में घुलने मिलने लगे। यहां तक की शासक भी बनने लगे। तब क्या ये लोग भारत की सभ्यता के लोग कहलाये जायेंगे? इसलिए इनको वमण सम्प्रदाय ही कहा जाता है। जैसे इग्लैण्ड के अन्दर समणों को समण सम्प्रदाय कहा जाता है।
4. खेतिय (क्षेत्रीय) पहचान: भारत में जो व्यक्ति जिस खेत (क्षेत्र) में पैदा होता है वो उसकी जन्म स्थल पहचान है। जहां जीवन भर अपना कार्य करता है वह उसका कार्य खेत (कार्यक्षेत्र) होता है। जहां कोई व्यक्ति अपना जीवन समाप्त करता है वह उसका परिनिव्वत खेत (अन्तिम क्षेत्र) होता है।
5. भासागत पहचान: जो व्यक्ति जो भासा बोलता है वह उसकी भासा गत पहचान कहलाती है। जैसे मलयाली, तमिल, गुजराती, उड़िया, पंजाबी, मराठी, तेलगू, पाली, ऊर्दू, अरबी, मारवाड़ी, संखारित पाली (हिन्दी), अंग्रेजी, जर्मनी, फ्रेंच आदि।
6. नाम रूप पहचान: पुराने समय में नाम का अर्थ होता था व्यक्ति के व्यवहार के गुण व अवगुण और रूप का अर्थ होता था व्यक्ति की काया के गुण व अवगुण। जैसे गुण अवगुण होते थे वैसी ही पहचान के लिए नाम रखा जाता था। जैसे काले बच्चे को काला, कालु, कृष्ण, किशन, किशना, कन्हैया, कण्ह, कण्हैया, सामा, सामावती, सामरी, सामरा, सावरा, सावल, सामल, सामलिया, आदि।
7. लिंगात्मक पहचान: सभी जीवों में तीन तरह की लिंगात्मक पहचान होती है। नर, नारी, अर्द्ध नर या अर्द्ध नारी।
8. जन्म जात पहचान, जन्म से पहचान, प्राकृतिक पहचान: भारत में आज भी दो तरह की पहचान है, जो व्यक्ति को जन्म से अपने आप मिलती हैं। या तो व्यक्ति समण होगा या व्यक्ति वमण होगा। जैसा की ऊपर बताया जा चुका है।