समण आदिकिसान कॉन्सेप्ट पर कोई सवाल नही बनता है और जो सवाल जवाब कर रहे है वो इस कॉन्सेप्ट से पुर्णतया अनभिज्ञ है क्योकी यह कोई रद्दी मे बिकने वाली किताबो के पन्नो मे लिखा कॉन्सेप्ट नही है।
यह कॉन्सेप्ट हमारे आसपास बिखरे पङे सबुतो व तथ्यों पर आधारित है। आप इसे परखना चावोगे तो हर एंगल से खरा पावोगे। जिन लोगो को अपनी दुकाने बंद होती दिख रही है वो लोग दिनरात समाज के लोगो को बरगलाकर अपनो के सामने खङा करने के कोशिश कर रहे है।
अक्षर ज्ञानीजनों को हर बात किताबों में लिखी हुई चाहिए जबकि
ज़मीन से जुड़े हुए लोग जब किताबों में लिखी बातों का सत्यापन करते हैं तो झोल समझ नहीं आता
इसलिए आदिकिसान विचारक कलम की धार से जो फर्जी मशीहा अंग्रेज हमारे समाजों पर थोप रखें हैं उनको लेकर सवाल खड़े करता है
किताबी लोग तिलमिला जातें हैं अरे भैया ऐसे काम नहीं चलेगा सवाल खड़े करने दो ताकि तर्क वितर्क में और भी सच्चाई सामने आ सकें अगर तुम्हारा मशीहा वाकई काबिले के प्रति कृतसंकल्पित रहा है
बिना कंट्रोल रिमोट खुद के विज़न के साथ तो हम भी उसे स्वीकार करेंगे लेकिन सवाल तो करने दो???
#जोहार


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