इंडिया की किसान ट्राइबल्स जातियों में 1990 के दशक के बाद लगातार बिखराव का कारण थाईलैण्डी और चम्पाई साहित्य है ।थाईलेंडियों का सनातनी इतिहास और चंपाइयों का मूलनिवासी इतिहास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।इनका सिर्फ और सिर्फ एक ही मंतव्य है की इंडिया की किसान ट्राइबल्स आपस में लड़ते रहें ।सबसे शानदार बात यह है की सनातनी इतिहास में थाईलेंडियों का कोई रोल नहीं है सिवाय लिखने के , ऐसे ही मूल निवासी इतिहास में भी चंपाइयों का कोई रोल नहीं है सिवाय लेखन के ।
थाईलेंडियों का सनातनी इतिहास आपको इतिहास में लड़ाइयां जीत कर राज करने वाला राजा बना देता है ( अलग अलग किसान ट्राइबल जाती का लग अलग इतिहास जो सिर्फ उसी जाती को पता है )
वैसे ही चंपाइयों का मूलनिवासी इतिहास आप पर इतने ज्यादा अत्याचार करवाता है की आपकी देखने , समझने और सोचने की शक्ति ही ख़तम कर देता है और यह अत्याचार सिर्फ किसान ट्राइबल्स पर ही होते है क्यूंकि मूलनिवासी के हिसाब से चम्पाई तो अभी अवर्ण हो चुके है जबकि पूना पैक्ट इन चंपाइयों ने ही थाईलेंडियों से किया था ।
अब आते हैं ज़मीन पर दिखने वाले इतिहास पर , पूरी दुनिया में यह एक सर्वमान्य तथ्य है की जिस भी जाती या मनुष्यों के समूहों का जिस जमीन पर कब्ज़ा रहा है वह वहां का मूल निवासी और राजा दोनों ही है क्यूंकि ज़मीन पर काबिज़ होने के लिए दिमाग और ताक़त दोनों की ज़रुरत होती है ।
किसान ट्राइबल्स जातियों में आज भी आपसी फैसले करने के लिए जाजम पर सभी बराबर बैठते हैं और सभी को अपनी बात रखने का बराबर का हक़ होता है ।यह प्रथा खुद बताती है की हमारे यहाँ राजशाही कभी नहीं थी सभी गणतांत्रिक गांव थे ।हाँ जब किसी एक कबीले का काबिल आदमी आगे आता था तो बाकि कबीले उस कबीले के साथ एकजुट होकर खड़े हो जाते थे ।इस के उदहारण आज के आधुनिक युग के नेता भी हैं , जैसे एक वक़्त में चरण सिंह और देवीलाल के पीछे सारी किसान ट्राइबल जातियां खड़ी थी ,बाद में राजेश पाइलट , शरद यादव जैसे क़बीलाई नेता हुए ।आज वही जगह राष्ट्रिय स्तर पर लालू प्रसाद और नितीश कुमार की है ।राजस्थान में देखें तो डॉ किरोड़ी मीणा वही जगह रखते है जो कभी नाथूराम मिर्धा की थी ।ऐसा ही कुछ पुरातन काल में हुआ होगा ।
आप अपने गांवों की तरफ देखिये , किसान ट्राइबल्स अपने गांवों और ज़मीनों पर काबिज़ हैं तथा अपने गांव के मामले वहीँ सुलटा लेते हैं और पास के गांव के किसी भी अफेयर में टांग नहीं घुसेड़ते ।ऐसा ही पहले था , यह गांव आज के नए नहीं बसे हुए बहुत पुराने हैं ।
इसी तरह मूलनिवासी वाले अत्यचार की कहानी , अगर पुराने ज़माने में कोई लड़ाई होती भी थी तो पूरी की पूरी ट्राइब को जगह छोड़ कर जाना पड़ता था या उन्हें गुलाम बना लिया जाता था ।जो जातियां अपने गांवों में ज़मीनों पर काबिज़ हैं उन्हें पता होगा की गुलामों को ज़मीन नहीं मिलती है ।न ही कोई ऐसा साक्ष्य है की हम लोग ज़मीन छोड़ कर विस्थापित हुए हैं ।हाँ यह ज़रूर सच है की यह थाईलैण्डी और चम्पाई हर इलाक़े में भूमिहीनों की तरह मौजूद है , यह अकेला साक्ष्य ही काफी है यह बताने के लिए की यह लोग इंडिया में रोज़ी रोटी के लिए शरणार्थी के तौर पर आये थे ।
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