Saturday, June 15, 2024

सांख्ययोग विश्लेषण: लोकसभा चुनाव 2024 18वीं लोकसभा के 543 सदस्य

प्रतिक्रिया में समण सत्यशोधक / कांशीराम बहुजन विचार विज्ञान केंद्र 

(Kanshiram Bahujan Vichar Vigyan Kendra)


यूपी में बहनजी ने जो घाव अतीत में भाजपा को दिए हैं, उसको भाजपा कभी भुलना नहीं चाहेंगी। भाजपा ने मजबूरी में बसपा को समर्थन देकर 1995 में बहनजी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था लेकिन भाजपा ने 4.5 महीने में ही बसपा से समर्थन लेकर बहन जी की सरकार गिरा दी थी क्योंकि भाजपा समझ चुकी थी कि बसपा अपनी विचारधारा का तो फैलाव कर रही है लेकिन भाजपा की हिन्दुत्वी विचारधारा कमजोर पड़ रही है। 1997 के विधान सभा चुनाव मे फिर किसी की मेजॉरिटी नही आई, बसपा मजबूत हुई व भाजपा कमजोर हुई और 6 महीने तक सरकार न बनने की स्थिति मे विधानसभा भंग होने के कगार पर खड़ी यूपी विधानसभा मे भाजपा ने फिर बसपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला लिया।


दोनों ने 6-6 महीने सरकार चलाने के फार्मुले पर सहमति बनाई, भाजपा चाहती थी कि वो बड़ी पार्टी होने के नाते पहले सरकार बनाएंगी लेकिन मान्यवर और बहनजी ने उनकी ये शर्त नहीं मानी। बहनजी को दूसरी बार फिर भाजपा ने समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनाया, बहनजी ने फिर अपनी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली नीति को ही आगे बढ़ाया, 6 महीने होते ही सरकार भाजपा की बनाई गई लेकिन कुछ ही दिनो मे भाजपा ने बसपा को तोड़ दिया और बाकी समय के लिए खुद ही मुख्यमंत्री पद पर कब्जा बरकरार रखा। बसपा और भाजपा के रिश्तों में फिर कड़वाहट भर गई। मान्यवर और बहनजी को 1999 में भाजपा से बदला लेने का फिर मौका मिला और अब की बार बसपा ने भाजपा को केन्द्र से ही अपनी 6 सांसदो की ताकत के बलबुते उखाड़ फेंका । अटल बिहारी वाजपेई की सरकार सिर्फ 1 वोट से गिरी थी, बसपा अंत तक इंतजार करती रही और जब संसद भवन में वोटिंग के दौरान उनको भरोसा हुआ कि सरकार गिराई जा सकती हैं, उन्होंने अपने सांसद मोहम्मद आरिफ खान को खुशी से चिल्लातें हुए कहाँ कि आरिफ लाल बटन दबाओ । उधर बसपा की 6 वोटे भाजपा की सरकार गिराने के पक्ष में गिरी और उधर वाजपेई सरकार 1 वोट से गिर गई। बहनजी मंत्री पद की भुखी या मौकापरस्त होती तो कई मंत्रीपद और अन्य फायदे ले सकती थी लेकिन उनकी राजनीति अन्य दलित नेताओं से अलग ही रही हैं, वो कांग्रेस या भाजपा की नहीं बल्कि अपनी सत्ता की लड़ाई लड़ती आई है।

2002 के आम चुनाव में फिर त्रिशंकु विधानसभा बनी, इस बार बसपा और ज्यादा मजबूत हुई और भाजपा और भी कमजोर हुई। भाजपा ने फिर बसपा को समर्थन देकर सरकार चलाने का मौका दिया। सरकार 2003 तक ठीक ठाक चली लेकिन भाजपा चाहती थी कि बसपा और भाजपा पूरे देश में मिलकर चुनाव लड़े और इसके बदले वो बहनजी को 2007 तक मुख्यमंत्री बने रहने का ऑफर भी दिया और साथ मे मान्यवर कांशीराम को भी राष्ट्रपति बनाने का ऑफर दिया। मान्यवर और बहन जी ने भाजपा से मिलकर चुनाव लड़ने को मना कर दिया और साथ में ही मुख्यमंत्री पद से भी इस्तीफा देने पर सहमति जताई। अगर बसपा और भाजपा का 2004 लोकसभा मे गठबंधन हो जाता तो शर्तिया 2004 में भी भाजपा की ही सरकार बनना तय था और हो सकता है, 2004 से लेकर आज तक भाजपा का ही शासन होता।

2007 चुनावों में भाजपा और भी कमजोर हुई और बसपा मेजॉरिटी की सरकार बनाने में सफल रही। 2012 के चुनावों तक मीडिया ने भी बसपा को खुब बदनाम किया और हर तरह से गुंडागर्दी के लिए मशहूर सपा सरकार को जीताने की कोशिशे की गई। फिर भी बसपा के 38 लाख वोट बढ़ी लेकिन सपा कांग्रेस भाजपा की अंदरूनी मिलीभगती के चलते सपा के 90 लाख वोट बढ़े और कांग्रेस भाजपा के वोटो के सपा में ट्रांसफर के चलते सपा ने चुनाव जीता। 2013 में अखिलेश यादव के कुशासन मे मुजफ्फरपुर शामली हिन्दू मुस्लिम दंगों के चलते भाजपा की तरफ हिन्दू वोटो का ध्रुवीकरण हुआ और हिन्दू मुस्लिम का सपा भाजपा मे बंटना शुरू हो गया। अखिलेश यादव की दंगो पर कंट्रोल न करने की नाकामी ने 2014 में भाजपा को 14% वोटो से सीधा 41% पर पहुंचवा कर केन्द्र में मोदी सरकार बनवाने का काम किया। भाजपा ने 2014 में 71 सीटें जीती और 2 उसके सहयोगियों ने जीती थी जिनकी बदौलत भाजपा की केन्द्र सरकार बनी थी।

2019 मे सपा बसपा रालोद गठबंधन में सिर्फ दलित मुस्लिम वोट ही थे, बाकी तकरीबन सब जातियाँ भाजपा की तरफ मुड़ चुकी थी। 2022 और 2024 चुनावों में बसपा से मुसलमानो और दलितों का काफी वोट मीडिया सोशल मीडिया की मेहरबानी और बसपा के राय बहादुरों की फैलाई नैगेटिविटी के कारण भाजपा को हराने के नाम पर सपा गंठबंधन को गया।

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