Friday, June 14, 2024

समण संघ की एक अवधारणा



"सुखा संघस्स सामग्गी,समग्गानं तपो सुखो " अर्थात संघ की एकता सुखदाई है तथा एकतायुक्त होकर किया गया कार्य अथवा धर्म साधना सुखदाई होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि समणसंघ* जिस जुड़ने एवं जोड़ने के कंसेप्ट को लेकर चल रहा है,वह आज का नहीं है बल्कि यह भगवान तथागत सम्यक सम्बुद्ध से भी पहले से है। भगवान बुद्ध ने भी संघ में रहने की बात कही । *संघं सरणं गच्छामि ।🙏 भगवान बुद्ध की इस बात को भिक्षुओं ने माना, स्वीकार किया । संघ बने। वह आज भी संघ में है । लेकिन भिक्खुओं के अनेकों संगठन दिखाई पड़ते हैं , उनमें भी एकता दिखाई नहीं पड़ती है ।इस समय भिक्षुओं को भी एक साथ संघ में रहने की आवश्यकता महसूस की जा रही है । उपासकों में संघ में रहने की अवधारणा सम्राट अशोक के समय तक रही । जब तक हम संघ में रहे,हमारी एकता रही, हम बलशाली रहे , समृद्धिशाली रहे, जमीन जायदाद रही । धनसम्पत्ति रही ,हम हर तरह से खुशहाल रहे । यहां तक कि हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाया । लेकिन बाद में संघ में रहने की अवधारणा धीरे धीरे समाप्त होती चली गई और हम कमजोर होते चले गए। असहाय होते चले गए और दरिद्र हो गए । हमारी जमीनें चली गई, धनसम्पत्ति , हमारी शिक्षा चली गई, हमारा समाज बिखर गया और हम सब कमजोर, असहाय और दरिद्र हो गए और ऐसी जिंदगी हमने हजारों साल जी है । बल्कि आज भी गांवों देहात एवं मलिन बस्तियों में ऐसी ही जिंदगी जी जा रही है ।
परंतु कालांतर में एक मसीहा, महामानव बोधिसत्व बाबा साहेब डा अम्बेडकर ने जन्म लिया और उन्होंने हम सब के कल्याण के लिए एक संघीय ढांचायुक्त संविधान दिया। जिससे देश आगे बढ़ा,हम आगे बढे, हमारा समाज आगे बढ़ा ,हम खुशहाल हुए । हम शिक्षित होने लगे ,खोई हुई सम्पत्ति ,जमीन -जायदाद वापस आने लगी,अच्छे-अच्छे मकान बनने लगे , बच्चे पढ लिखकर अच्छी-अच्छी नौकरियां करने लगे, हम छोटे-मोटे उद्योग धन्धें लगाने लगे ,हम गौरवान्वित महसूस करने लगे, प्रदेश और देश के सर्वोच्च पदों पर पहुंचने लगे लेकिन साथ ही हम अपने पुराने दुश्मन से बेपरवाह हो गए , असावधान हो गए । वह हमारा पुराना दुश्मन लगातार शांत नहीं रहा। हमारी प्रगति को रोकने के लिए नये नये तरीके ढूंढता रहा ,नई-नई चालें चलता रहा, जिससे वह अपनी पुरानी मनुवादी व्यवस्था को लागू कर सके, पूंजीवादी व्यवस्था आ सके । लेकिन बाबा साहेब द्वारा बनाया गया संघीय ढांचायुक्त संविधान हमारी सुरक्षा कवच बनकर सामने खड़ा रहा । लेकिन हमारा दुश्मन बहुत ही शातिर दिमाग का है उसने हमारे सुरक्षा कवच को ही निशाने पर ले लिया है।नये नये संविधान संशोधनों एवं कानूनों के द्वारा संविधान को कमजोर किया जा रहा है । यहां तक कि संविधान को ही समाप्त करने की बातें होने लगी है । लेकिन हम सब अब भी अचेत है ।अपने अधिकारों के प्रति सजग एवं जागरूक नहीं है ।
हालांकि बाबा साहेब ने इन खतरों को पहले ही भांप लिया था क्योंकि कोई बाप अपनी संतानों को हर तरह से सुरक्षित करने की पूरी कोशिश करता है और बाबा साहेब ने भी हमें सफल जिंदगी के लिए तीन मूल मंत्र दिए । शिक्षित बनो, संगठित बनो , संघर्ष करो । बाबा साहेब ने हमे बताया कि संगठित रहोगे,संघ में रहोगे तो तुम्हारे अधिकार बने रहेंगे।जो संविधान मैंने दिया है उसे सुरक्षित रख पाओगे । लेकिन हम नालायक संतानें संगठित न होकर, उन्नतीस लाख संगठन बना डाले । और असंगठित हो गए जिससे हमारे अधिकार धीरे धीरे समाप्त होते चले जा रहे है । हमें पुनः वहीं पहुंचाने की कोशिश की जा रही है जहां से बोधिसत्व बाबा साहेब डा भीमराव अम्बेडकर जी ने हमे 70 वर्ष पहले निकाला था । बाबा साहेब के संघर्षों के परिणामस्वरूप हम सम्मानपूर्वक जीवन जीने की स्थिति में आएं हैं । इसे किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होने देना है। ‌ इसलिए मेरी सभी से विनम्र अपील है कि अब संगठन-संगठन न खेले बल्कि अपने अधिकारों एवं संविधान की सुरक्षा के लिए संघ-संघ खेले । अपनें संविधान को बचाने की पहली प्राथमिकता बनाएं । अपनें महापुरुषों, तथागत सम्यक सम्बुद्ध, बोधिसत्व बाबा साहेब, सम्राट अशोक एवं अन्य महान संतों, महापुरुषों के द्वारा संघ में रहने की सलाह को अपनाकर आगे बढ़ना होगा । तभी हम अपने बच्चों, युवाओं का भविष्य सुरक्षित बना पाएंगे । हमारा भविष्य हमारे बच्चे एवं युवा वर्ग है अतः उन्हें भी साथ लेकर संघ में रहने का लाभ और संघ में रहने से प्राप्त होने वाली शक्ति से अवगत कराते रहें । जिससे वह वह अभी से संघ में रहने लगे । इसके लिए हमें समण संघ के जुड़ो और जोड़ो के कंसेप्ट को स्वीकार करना होगा ।  जल्दी जुड़ो, जल्दी जीतो ।

 एस आर बौद्ध स्पोक कानपुर (सत्यशोधक समण)

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