सम-यक (सम-यत) दर्शन क्या है?
जो विष-मय (विस्मय) ज्ञान से पार पा लिया हो वह पारगू है। जो वेदना (दुःख हेतु) से पार पा लिया हो वह वेदान्तगू है। जहां न ऊंच नीच का भेद न हो सम हो, समदृष्टि यानी सम देखता हो, सम सुनता हो, समवचन करता हो वही सम्यक दर्शन है।
जो प्राकृति की धम्मं-मिमांसा (Epistemo-logy) को जानता हो
जो न्याय के विशेष गुणों को जानता हो
जो अपरिहानियविनय संघ में संख्या योग करता हो, वही सम्यक दर्शन के योग्य है वही योगी है वही सन्निकट-सन्निपात-सन्नीचरया बाहुल करने के पात्र है वह संघ में बहुमूल्य रत्न-तिल (तिल्ली-दाना) है क्योंकि वह विमुक्त है व्यक्ति "वाद" के गुण से, ऐसे हैं जो Ism-वाद से बाहर नहीं सोचते या सोचते ही वाद भ्रम में फंस-फंसाकर किन्तु-परन्तु यक-यत के मन-मत को कैद रखता है-
जैसे प्रकृति-वाद (Naturalism), यथार्थ-वाद (Realism), आदर्श-वाद (Idealism), व्यवहार-वाद (Pragmatism), धरम-वाद Religionism) अस्तित्व-वाद (Existentialism), अध्यात्म-वाद (Spiritualism), पदार्थ-वाद (Materialism) आदि अनादि के मत मतान्तर में ही जाति जरा ब्याधि मच्चु में जीवन नष्ट कर देता है। ऐसा जीवन भर नाम-रूप (तन-मन) का चक्र किसी एक संज्ञा विशेषण के चाहिए चाहिए की मूढ़ मूढ़ता (craving craving) में बढ़ा जाता है यानी नष्ट हो जाता है। इससे विमुक्त हो जाना इन दुःख हेतु को जान लेना ही वेदांतगू है इससे पार पा लेना ही पारगू है।


No comments:
Post a Comment